स्वाद का भी एक अनोखा संसार
होता है

यह फल मीठा है या खट्टा

यह वस्तु कसैली है या विषैली

यह खाने योग्य है या फेंकने लायक

यह मसाला तीखा है या फीका

इस भोजन में किरकिरी है या
है यह भुरभुरी

बिना दांत के भी खा सकते क्या

इसे

बिना आंत के भी पचा सकते क्या

इसे

यह पकवान अति स्वादिष्ट है या

बस ठीक ठीक

इस व्यंजन को देख मुह में पानी आता

है

या चेहरे का जॉग्राफिया ही

बिगड़ जाता है

यह मिष्ठान चाशनी में डूबा है

तो दूसरा है लिबलिबा, चिपचिपा, लेसदार

हाथों में चिपक गया

अरे यह है फुला तो दूसरा है पिचका

यह ठंडा है वो गर्म है

यह कड़क है वो नरम है

यह नमकीन है वो चिरपिरा है

यह जीभ पे जमता है वो फिसलता है

इसने जीभ जला दी उसने सपनों में आ

आकर रातों की नींद ही उड़ा दी

इसे पकाकर खाया उसे कच्चा ही

चबाया

यह मुह में जाते ही बाहर आ गया

वो च्युइंगम की तरह चबाते चबाते

जबड़े को ही दुखा गया

यह पेय पदार्थ सिप सिप
करके पीया

यह पान का पत्ता मुह में जाते ही

रंगों भरे गुब्बारे की पिचकारी सा

फटा

यह दांतों को काला कर गया

वो दांतों में फांस सा फंस गया

यह गले में सीधा उतर गया

वो बीच रास्ते ही अटक गया

उसे साबुत खाया

दूसरे को टुकड़ा टुकड़ा चबाया

इसे सीधा निगल लिया

उसे चूस चूस के बेरस झाड़ सा

बना दिया

इसे कचर कचर खाया

उसे कुतर कुतर चरमराया

इसके स्वाद को टटोलते रहे

खाली पैकेट में

उसके थर्माकोल के गिलास को उल्टाकर

जीभ पे टप टप टपकाया

इसे गटक कुल्हड़ फेंक दिया बीच सड़क

उसे सटक दोना उछाल दिया

अपनी तरफ से दूसरी तरफ

जब बात हो स्वाद की

तो दुनिया जहां का दर्द हो

जाये छूमंतर

जैसे गुल हो गई हो दिमाग की

बत्ती

बिना बिजली बिना तार के

न ये दिखे न वो दिखे

न आजू बाजू कोई भीड़ चले

बस खुद पे पूरा ध्यान केंद्रित

आंखों के सामने थाली तैरे

छप्पन लजीज व्यंजनों से सजी भोग के प्रसाद की।

मीनल

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