सुमिरन

सुमिरन

भाग दौड़ चल लपक चाँद को
लेकर जा रही कहाँ लहर डूबती सांझ को
नैय्या तैर रही
डूबने का भी तो डर है
लगी न जो किनारे
बीच भंवर फंस जाने का
भी तो डर है
कष्ट कोई आये
उससे पहले प्रभु बचा लो
सुमिरन करूं तुम्हारा
मेरी जीवन की नैय्या पार
लगा दो
भोर हो प्रतिदिन मेरी रंगों भरी
हो उज्ज्वल कामना
हो सागर की गगरी भरी
न नैन छलके
कुछ ऐसा करो उपाय
सांझ हो मधुर
रात की देहरी पे दीप जले
मन हो हल्का
तन के वृक्ष मोरपंखी से झले।

मीनल

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