सैनिक अर्धांगनी

सैनिक अर्धांगनी

सैनिक अर्धांगनी

सज सँवर बोली में बैठ, आई सैनिक की अर्धांगनी,
देखकर जज्बा पति का ,पुलकित हुई वह कामिनी।
क्या भाग्य मेरा है जगा,वह मन ही मन में सोचती,
पर क्षणिक आशंका वहीं, उसके मन को कचोटती।
कल चला जाएगा जब, यह देशभक्त सीमा प्रहरी,
कैसे सहूंगी वेदना यह, सोच चक्षु बनते निर्झरी।
तत्काल हिय से लिपट वह, पति के मुख को देखती,
उनके मधुर मुस्कान को, भर हिय में वह सहेजती।
फिर कब मिलन होगा सजन, जवाब मन में ढूँढती ,
और काँपते अधरों से निकले ,शब्द को वह तौलती।
अपना सर्वस्व कर समर्पण, बनती सबला वह संगिनी
आश्वस्त कर कहती पति को ,मै हूँ तुम्हारी अर्धांगनी।
निस्वार्थ तुम बढ़ते चलो ,जो राह है तुमने चुनी,
इस राष्ट्र के हो सपूत तुम, तेरी वीरता सबसे धनी।
कर्तव्य का पालन करो ,आह्वान करती जग वंदिनी,
हैं अश्रुपूरित नयन मेरे ,क्योंकि मैं हूँ तुम्हारी अर्धांगनी।

परिचय : डॉ. हेमा सिंह
पेशा : हिन्दी अध्यापिका

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