अनहोनी

अनहोनी

कितने पत्थर मारे हैं
आसमां ने
कि समुन्दर का किनारा भर गया
घात लगाये बैठी है कोई अनहोनी
कि माहौल खामोश है
और कोई दिख भी नहीं रहा
तूफान आने से पहले ऐसे ही
पानियों में बुलबुले फूटते हैं
बवंडर आते हैं फिर ऐसे कि
दिल के जख्म जिस्म पे
कहीं एक कदम भर रखने के लिए
जमीं ढूंढते हैं
सप्तरंग मिलकर बन जाते हैं
फिर एक सफेद रंग
आसमान और समुन्दर के
पानियों को अलग करने के लिए
फिर हम काले रंग के धुएं की
कोई लकीर ढूंढते हैं।

मीनल

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