हिन्दी दिवस

 

है वो मातृभाषा ,,
है वो हमारी संस्कृति ,,
है वो हमारी सभ्यता की पहचान ।

अर्थ वादक समुन्द्र सी गहराई तुम में
है उज्ज्वल पथ की डोर ,,

हम क्यों शर्म करें ,,
क्यों अपनाएँ विदेशी भाषा क्यों
ना हम इसका बहिष्कार करें ।

क्यों ना हम विवेकानंद ,चाण्क्य की नीति – रीति -रिवाज
कर्म का बोध गीता ज्ञान करें ,,
आओं मिलकर लौट चले अपने पूर्वजों के पथ ,,
आओं मिलकर जय गान करें ,,
विदेशी छोड़ स्वदेशी पर आन करें ।

  स्वरचित – मनकेश्वर महाराज “भट्ट” (गृह शिक्षक , लेखक , कवि )
रामपुर डेहरू , जोतैली , मधेपुरा ,बिहार

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Mankeshwar Kumar Maharaj

गृह शिक्षक , लेखक , कवि

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