जिंदगी

जिंदगी क्या कहूँ तुझे,

तू कभी सहेली है ,

कभी तू पहेली है,

जितनी भी गुजरी है तू!

बहुत खूब गुजरी है!

कई दफा तू बडी़ हसीन लगी मुझे

कई दफा मुझसे ही बडी़ गमगीन लगी तू,

हर मोड़ पर तू बहुत अलग लगी तू,

या कहूँ…तेरे संग मैं भी

बडी़ अजीब लगी हूं!!

साथ साथ चले है हम

फिर भी ओरों के करीब लगी है तू

कभी तू मुझमें

और मैं तुझमे विलीन हुई

देखते देखते कितनी राहों पर

हम एक दूसरे के अधीन हुए ,

तू साथ है फिरभी,
क्यों अकेली मैं?
जिंदगी तू बेवफा तो नहीं?
फिर क्यों वफा नहीं तेरी मुझसे?
भीड़ में कही तू
मुझमे खो तो नहीं गई?
या साथ चलते चलते कही
हम दोनों खो गए,
इस संसार के भीड़ में,
खुद के अकेलेपन में???

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