मैं एक फूल हूं

मैं एक फूल हूं
कांटों से घिरा
खरपतवार के बीच खड़ा
गीली गिलगिली मिट्टी में धंसा
धूप, आंधी, बरसात, बदलते मौसम
न जाने ऐसी कितनी ही विषम परिस्थितियों
में फंसा
स्वाभिमान से भरा
खिलकर हंसा
न झुका न गिरा
सीधा और लम्बवत
सावधान की स्थिति में
खड़ा
देखता हूं बसंत की ऋतु में अपना
चेहरा
समय के आईने में
समय से पहले मुर्झाता नहीं हूं मैं
चाहे सिर पे आ जाये मेरे कितनी ही
असहज कर देने वाली
असमय आने वाली
विपत्तियां
प्रस्तुत करता हूं मैं खुद को
एक यौवना के श्रृंगार के लिए
एक माली के दुलार के लिए
एक राहगीर के इस्तकबाल के लिए
एक पुजारी के भक्तिभाव के लिए
एक भंवरे की गुंजन के लिए
एक तितली की प्रीत के लिए
एक बहार के आगमन के लिए
एक पतझड़ के विरह के लिए
एक जीवन के अर्पण के लिए
एक मृत्यु के तर्पण के लिए
एक प्रेम की गली में खिलते
चांद के लिए
एक ईर्ष्या की अग्नि में जलते
अंगार के लिए
एक खिलकर जीवन का अर्थ
समझाने के लिए
एक मिटकर दूसरों के चेहरे पे
मुस्कुराहट लाने के लिए।

मीनल

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