मेरी चाहतें

तुम फूल बन जाते , और मैं ओंस की बूंद ,,
मैं आऊं तो खिल जाओ , नहीं तो मुरझाने सा – हो जाना।।

तुम राधा रानी और मैं कृष्ण सा बन जाऊं,,
और रसखान सा कोई मेरी बखान करें…

तुम डोर बन जाते और मैं सुरों में धुन,,
तुम बिन हम अधूरे और हम बिन तुम अधूरे हो जाते..

तुम पतझड़ की वो पत बन जाओ , और मैं बसंत की पहली फुहार,,
लगी रहे मेरी आने की आस , और मैं पडूँ तो पत – पत हरा हो जाए…

तुम करवा चौथ की पुजारिन , और मैं हो जाऊं दूर –
सा चाँद,,
मेरे आते ही तुम्हारी सारी ख्वाइशें पूरी हो जाए ,और ना आए तो सब कुछ जैसे खत्म सा हो जाए……

स्वरचित – मनकेश्वर महाराज “भट्ट”

             रामपुर डेहरू , मधेपुरा , बिहार

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Mankeshwar Kumar Maharaj

गृह शिक्षक , लेखक , कवि

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