भक्त भानुदास

भक्त भानुदास

By |2018-01-20T17:08:59+00:00March 26th, 2016|Categories: बाल कथाएँ|0 Comments

भक्त भानुदास हर समय हरी भजन में लगे रहें रहते थे| उनके माता-पिता जब जाट जीवित रहे, भानुदास और उनके पत्नी-बच्चों का पालन – पोषण करते रहे , पर उनकी मृत्यु के बाद वे भूखों मरने लगे| पड़ोसियों ने दया दिखलाते हुए चंदा एकत्रित किया और जमा राशि से भानुदास के लिए दुकान खुलवा दी|

भानुदास व्यापर में असत्य का सहारा नहीं लेते थे| वे ग्राहकों से मॉल के सही मूल्य और स्वयं को होने वाले लाभ की स्पस्ट चर्चा करते | इस कारन उनकी साख बाज़ार में जम गई| भानुदास का व्यापर दिनोंदिन बढ़ने लगा| इससे कुछ व्यापारी भानुदास से ईर्ष्या करने लगे |एक दिन नगर में कीर्तन का आयोजन हुआ| भानुदास हरी भक्ति के इस अवसर को छोड़ना नहीं चाहते थे सो दुकान जल्दी बंद कर वे चल पड़े | जाते-जाते उन्होंने पड़ोस के व्यापारियों से दुकान का ध्यान रखने को कहा पर व्यापारियों ने इससे इंकार कर दिया| भानुदास को कीर्तन में किसी भी कीमत पर जान ही था| वह माल लादने वाला अपना घोड़ा दुकान पर बांधकर कीर्तन में चले गए |

व्यापारियों ने बदला लेने का अच्छा मौका देख उनके घोड़े को खोल दिया और दुकान का सारा सामान पास के गड्डे में भर दिया | फिर शोर मचा दिया की भानुदास की दुकान में चोरी हो गई है| ऐसा करने के बाद सभी व्यापारी अपनी-अपनी दुकान बंद करके जा हे रहे थे की डाकुओं ने उनपर धावा बोल दिया और दिन भर की सारी कमाई और सामान लेकर चले गए |

भानुदास जब वापस लौटे तो व्यापारियों ने भानुदास को सारी बात बताई| उन्होंने यह भी बताया कि भानुदास की दुकान का सारा सामान कहाँ पड़ा है| भानुदास केवल इतना कह सके , ” दूसरों का अहित करने वालों का अंततः बुरा होता है| इसलिए हमेशा अच्छा सोचें और अच्छा करने का प्रयास करें|”

भानुदास की बात सुनकर व्यापारी अपने किये पर बहुत शर्मिंदा हुए | भानुदास ने अपनी संचित आय में से उन्हें थोड़ा -थोड़ा धन  व्यापर शुरू करने के लिए दिया|

– सौजन्य -पाठ्य पुस्तक – संख

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