तितली की बदौलत

मैं एक तितली
फूल सी सुंदर
बगिया की मैं एक मेहमान
फूलों पे मंडराऊं
कलियों की सेज मेरे जीने का
सामान
फूलों का मैं रसपान करूं
फूलों का इत्र अपने तन पे मलूं
फूलों का संग छोड़
हवा में जो उडूँ
खुशबू फैलाऊं
अपनी दोस्ती का दम मैं भरूं
फूल की सुगन्ध
रचीबसी मेरे तन में
जो मेरे व्यक्तित्व की पहचान
फूल और मेरा रिश्ता ऐसा
जैसे दर्पण में मैंने खुद का मुख
देखा
फूल के समीप उससे आलिंगनबद्ध एक लचकती नन्ही कली
जब मैं समीप आई
तभी तो
मंद मंद मुस्कुराकर
शोख हवा सी लहराकर
कली कली शबनमी कतरा कतरा इतराकर
एक वयस्क पुष्प सी
तितली की बदौलत
वो खिली।

मीनल

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