कुम्हार के चाक सी

कुम्हार के चाक सी चल रही
जिन्दगी
बर्तन भांडे से मिट्टी की काया से
बन बन के निकल रहे
आकार ले लेते कभी कभार यह
भगवान की मूरत का भी
कच्चे ही टूट जाते
अग्नि में पककर पक्के हुए
फिर भी टूटफूट कर यहां वहां
यदाकदा टुकड़ा टुकड़ा बिखर रहे
आस्था रही नहीं
धर्म में आडंबर का बोलबाला
है
इंसान इंसान को पूछ नहीं रहा
भगवान से मन्दिर में रोज मिलने का
इरादा है
यह तो महज एक दिखावा है
यह छल है घोर विनाशकारी
सर्वदा अहितकारी
किसी चाक पे पिसती गीली
माटी की विसर्जित ऊर्जा सा
उसकी देह के परित्याग के
अभिशाप सा
उसकी आत्मा संग भस्म
होती आग सा।

मीनल

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