हा, समुद्र हूँ मैं

हा, समुद्र हूँ मैं

हा, समुद्र हूँ मैं, मेरा जल खारा जरूर है,मैं किसी का प्यास नहीं बुझा सकता हूँ, फिर भी नदियों का अंतिम मंजिल हूँ मैं  हा, समुद्र हूँ मैं

मुझमे निवास करते हैं कई जलचर जीव,मेरे तट पर आने वाले लोंगो को अक्सर कुछ दे दिया करता हूँ,क्योंकि देना ही जानता हूँ मैं  हा, समुद्र हूँ मैं

लेकिन,देता हूँ निश्वार्थ भाव से चाहें आश्रय नदियों को देना हो,जलचरों को,अथवा मनुष्यों को उनकी लायक चीजें किसी से भेदभाव नहीं करता हूँ मैं, हा समुद्र हूँ मैं

काश!तुम मनुष्य भी मुझसे सीख पाते,निश्वार्थ भाव से इस समाज को देना जानते,जिससे ईर्ष्या, कलह इस समाज से मिट जाता, और फिर स्वर्ग भी भू पर आ जाता यही बात तुम मनुष्यों से बार-बार कहता हूँ मैं, हा समुद्र हूँ मैं

:कुमार किशन कीर्ति

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Kumar kishan kirti

युवा शायर,लेखक

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