जिस्म और रूह का रिश्ता

जिस्म और रूह का रिश्ता

नीली स्याही के समंदर में
आसमां के बादलों सी
उतरती मेरी काले धब्बों की
परछाई
यह दुनिया का मायाजाल मुझे
जकड़ ले
इससे पहले मैं इससे पीछा छुड़ाकर कहीं
भाग जाना चाहती हूं
पर कहाँ
आसमां के किस मोड़ पे मुझे
जगह मिलेगी पांव धरने की
जिस्म का भार कौन वहन करेगा
रूह कपकपाती परिन्दे सी
अपने पंख फड़फड़ाती किसी अंजान
दिशा उड़ गई तो
जिस्म और रूह के रिश्ते को
किस डोर से बांध पाऊंगी।

मीनल

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