परदेश का क्लेश

उनकी जिद्द अव मन की ख्वाहिश ||
नौनिहाल ले शहर को आयी ||

यहाँ पर आ के पता चला अब ||
लोग न समझे पीर परायी ||

दूध के खातिर रोता बच्चा ||
कमरा लिया किराए पर ||

मजदूरी के लिए लगे जाने ||
वे लेबर चौक चौराहे पर ||

खाने पीने की आ गयी दिक्कत ||
किस्मत ने कर ली रुस्वाई ||

यहाँ पर आ के पता चला अब ||
लोग न समझे पीर परायी ||

पास पड़ोसी बात करे नहीं ||
हाल चाल नहीं पूंछे ||

ऐसी हवा चली किस्मत ने ||
रिश्ते नाते सब रूठे ||

कुंठित मन कर वे भी बोले ||
ताना मारे परछाई ||

यहाँ पर आ के पता चला अब ||
लोग न समझे पीर परायी ||

मजदूरी ठेकेदार दिया नहीं ||
देने लगा था गाली ||

बेटा हुआ बिमार रात में ||
हंसने लगी परेशनी ||

कान की बाली बेंच कर हमने ||
बेटे की लायी दवाई ||

यहाँ पर आ के पता चला अब ||
लोग न समझे पीर परायी ||

शम्भू नाथ कैलाशी

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शम्भनाथ

पिता का नाम स्वर्गीय श्री बाबूलाल गाँव कलापुर रानीगंज कैथौला प्रतापगढ़ उत्तर-प्रदेश जन्म ०७/०८/१९७४ शिक्षा परानास्तक पुस्तकालय विज्ञानं पेसा नौकरी

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