रूह के पंछी

आस्था की माला के मोती
टूट गये
गजरे की धार से चमेली के
फूल झर गये
विश्वास की सच्ची डोर से जो बंधे थे
दिल के पावन रिश्ते
वो टूट गये
कितना बांधा मोह के पाश में
प्रेम की अभिव्यक्ति को
देह की दीवार दरारों से भरी
सुखी पपड़ियों से परत दर परत
मिट्टी सी जो झड़ी
सारे सांसारिक सुख दुख छोड़
रूह के पंछी खुद से जकड़ी जंजीरों से
मुक्त हो
खुली हवा में आजाद
चैन से श्वास भरते
किसी विचित्र स्थल की ओर
सर्वस्व त्याग
गतिमान हो गये।

मीनल

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