टूटे दिल

इस गुलाब को
इसकी टहनी, पत्तों और कांटों समेत
क्यों तोड़ा
मुझे उपहार में देने के लिए
इससे अच्छा तो मुझे लिये चलते
उपवन में
पल दो पल बैठते किसी बेंच पर
पेड़ की छांव में
लहलहाते फूलों के गांव में
टहलते, बतियाते, प्रीत के गीत गुनगुनाते
बसंती मौसम की फुहार में
गुलाब की गुलाबी काया को
अपनी नाजुक अंगुलियों की पोरों से मैं
पौधे में लगे लगे सहला देती
उसकी खुशबू को अपने दामन में
भरती
उसके गालों पे रक्तरंजित चुम्बन
और उसके माथे पे गुलाल का टीका
लगा देती
बेवजह किसी को समय से पहले
क्यों मारना, क्यों रुलाना, क्यों सताना,
क्यों उखाड़ना
हंसते हुए बेशक दिखते हैं सब
पर अंदर से बिखरे पड़े हैं
टूटे हैं दिल पहले से ही सबके
उन्हें और क्या तोड़ना।

मीनल

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