मां की अरज

मां की अरज

ऐ खुदा
मैं पंख इतने फैला पाऊं कि
अपने सब बच्चों को उसमें समेट पाऊं
मैं एक घने पेड़ की छांव सी
ऐ प्रभु
मुझे ताकत इतनी देना कि
सूरज की गर्मी से अपने जिगर के
टुकड़ों के कोमल रोये भरे जलते हुए तन को बचा
पाऊं
कोई भी विपदा पड़े
कोई भी आंधी चले
वक्त के थपेड़ों से अपने नन्हे-मुन्नों को
निकाल पाऊं
यह तो बहुत मासूम हैं अभी
इस संसार में नये नये जन्मे हैं
किसी भी दुर्घटना से अंजान हैं
अपनी ही दुनिया में खोये हैं
भोले हैं, नादान हैं
खाना पीना, खेलना कूदना,
सोना जगना, लड़ना झगड़ना
यही इनकी दिनचर्या है
जीवन की कठिन डगर
कांटों भरा सफर
जटिल आपदाओं का कहर
जिन्दगी के खेल से
यह पूर्णतया अनभिज्ञ हैं
मां के ही आंचल में
पंख फड़फड़ाते अभी तो यह
मानसिक रूप से अपरिपक्व
और न ही पहली उड़ान भरने को
तैय्यार हैं।

मीनल

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This Post Has One Comment

  1. SUBODH PATEL

    बेहतरीन

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