सामान

राही हूं
एक भटका हुआ
मंजिल की खबर नहीं
बीच राह
रुक गया
खुद की फिक्र नहीं
मैं इस धरती पे खुद एक बोझ हूं
सामान क्या उठाऊं
छोड़ देता हूं इसे बीच चौराहे
अतीत की यादों को एक दर्द की
चुभन सा
दिल से क्यों लगाऊं
उठाये या न उठाये इसे कोई दूसरा
मुझे क्या करना
इस संसार में हर वस्तु का मोह
करना है एक लालच
सुकून की एक गहरी श्वास भरकर
इससे बचकर
खेत की हरी भरी पगडंडी पे
ही संभल संभलकर
मुझे तो छोटे छोटे पग भरना।

मीनल

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