इंतज़ार -ए -ख़त (गजल)

जाने किसके ख़त का हमें रहता है इंतज़ार ,

जब कोई नहीं लिखनेवाला, फिर भी बेक़रार !

दौड़ पढ़ते है घर की चौखट पर आहट पाकर ,

जैसे कोई पैगाम हो देने वाला दर पर आकर ।

पुछते फिरते है रफीकों से हम ”कोई ख़त आया ”,

हमारे सवाल पर होती है उनकी सवालिया नज़र ।

एक कशमकश सी छोड़ देते हैं वो  ज़हन में हमारे ,

सरशके गम से  यह मतवाला दिल हो जाता है तर ।

अब यह हमारी तक़दीर का सितम नहीं है तो क्या है ? ,

जिसकी तलब ने हमें दीवाना बनाया ,वो है  किधर !

जाने कितनी बार ख़त लिखकर उसके टुकड़े -टुकड़े किए ,

नहीं इन खातों के नसीब में जवाब ”अनु ” न हो यूं बेकरार ।

 

 

 

 

 

 

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ओनिका सेतिया 'अनु'

संक्षिप्त परिचय नाम -- सौ .ओनिका सेतिया "अनु' , शिक्षा -- स्नातकोत्तर विधा -- ग़ज़ल, कविता, मुक्तक , शेर , लघु-कथा , कहानी , भजन, गीत , लेख , परिचर्चा , आदि।

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