वो आँखे

सरपट भागती ट्रैन के साथ और हर बदलते नजारे के साथ बदल जाते है उसके चेहरे की भावनाएं,उसकी वो हँसी, वो नजाकत भरी नजरें पल पल बदलते नजारे के साथ बदलती उसकी हर एक अदा दीवाना बनाती है मुझे ….. देखता हूँ मैं हर रोज और कोशिश करता हूँ उन्हें पढ़ने की…ऊंची ऊंची इमारतो से जैसे पूँछती है उसकी नजरे तुम इतनी ऊंची क्यों हो ,डर नही लगता क्या तुम्हें ऊँचाई से…अगले ही पल देख किसी पेड़ को कहती उसकी नज़रे यूँ ही हरे भरे रहना पतझड आने पर घबराना नही ..पतझड़ के बाद बसन्त जरूर आएगा…देख किसी नदी को मुस्कुराती उसकी आंखें कहती बहा ले चल तू मुझे अपने संग उस किनारे तक जहाँ तक न पहुँचती है मेरी नजर…आकर ठंडी पवन जब सहलाती है उसके गालों को बंद कर आंखे वो महसूस करती है उसे जैसे उसकी हर आती जाती सांस अमानत हो किसी की….जब दिखता उसे कोई बाग बगीचा तो लगता बस वो वही थम जाना चाहती है  …आती जाती गाड़ियों से जैसे कहती हो फिर मिलेंगे जब रुक जाती है ट्रेन तो ऐसे छा जाती है उदासी उसके चेहरे पर जैसे काट दिए हो पर किसी ने एक उड़ते पंछी के ….. जैसे रुकती ट्रैन के साथ रुक गयी हो उसकी जिंदगी …एक उदासी ,एक मुस्कान, एक खामोशी और वो एक कहानी जो मैं रोज पढ़ने की नाकाम कोशिश करता हूँ उसकी आँखों में……।।

Rating: 5.0/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...

Leave a Reply

Close Menu