उत्सव

दबे पांव आऊंगी मैं
सांसों में समाऊंगी मैं
कानों में मिसरी सी घुल के
दिल में उतर जाऊंगी मैं
पानी में चलूंगी छप छप
पर झंकार न होगी
पत्ते भी पेड़ों से लिपटे
मुंह पे अंगुली रख
चुपचाप खड़े रहेंगे
कोई आहट न होगी
आज तो इसी पल अपना तो
मिलन तय है
जंगल सारा झूमेगा
मोर सारे नाचेंगे
कोयल कूकेगी
पंछी सारे गायेंगे
प्रेम की बारिश होगी
अपने मन आंगन
दबे पांव खामोशी से
उसे सुनने
उत्सव मनाने
प्रेम से विरक्त
दुख से संतप्त
विरह मन भी
तृप्त होने
खिंचे चले
आयेंगे।

मीनल

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