रावण शर्मिंदा होता

अच्छाई क्या है
बुराई क्या है
अच्छाई और बुराई
कैसे करेंगे आप इन्हें
परिभाषित
इन दोनों शब्दों का अर्थ क्या
है
एक या अनेक
इनका एक रूप है या अनेक
आज के युग में
अच्छाई पे बुराई और
बुराई पे अच्छाई का मुखौटा
चढ़ा है
कैसे फर्क करेंगे
बुराई के दलदल में सच्चाई का
सांस लेना दूभर है
सब चल रहे बुराई के मार्ग पे
जो चलना चाहे अच्छाई की राह पे
उसका उस रास्ते पे चलना
और मंजिल पाना नामुमकिन है
पीठ थपथपाई जाती
बुराई की
चरण वंदना की जाती
बुराई की
गले में फूलों की माला पहनाई जाती
बुराई की
ऊंचे आसन पे प्रतिमा
विराजमान होती
बुराई की
अच्छाई भीड़ के बीच में खोया,
भटका और भुलाया गया एक किस्सा है
समाज का एक बेबुनियाद
हिस्सा है
महज एक दर्शक है
बहरा नहीं
सब सुन सकता है
गूंगा है
बोल कुछ नहीं सकता
कोने में खड़े खड़े आंसू
बहाना है इसकी नियति
व्यवस्था, अर्थव्यवस्था
सब चरमराई हुई हैं
झूठ का बोलबाला है
सच सुनने को कोई तैय्यार नहीं
समाज की,
दुनिया की छोड़ो
घर भी अब तो एक कैदखाना है
विकृत मानसिकताएं लिये
जी रहे हैं सब यहां भी
रूढ़िवादिता की न जाने
कितनी ही बेड़ियों में
बेवजह
बिना किसी फरमान के
जकड़े हैं
अच्छा है
रावण आज के युग में
पैदा नहीं हुआ
नहीं तो
जिस चेहरे की तरफ
अपने दस सिर उठाकर
देखता
तो शर्मिंदा होता
दस के दस सिर
एक साथ शर्म से झुका
लेता
खुद को बहुत असहाय महसूस करता
एक पंख कटा
घायल आत्मा लिये
फड़फड़ाता
बिना आवाज का
परिंदा होता।

मीनल

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