तलाश

तलाश में थी
तुम मेरी या
मैं तुम्हारी
कितना घुलमिल गई हो
कितना मेरे रंग में रंग गई हो
कहाँ तलाशती हो मुझे
मैं हूं तुम्हारे पास
दूर नहीं करीब हूं
मन की रेखाओं के आसपास
आहट मेरे कदमों की अब न
होगी
गीली मिट्टी से सूख चुके हैं
प्रेम तो है एक अंदरूनी आवरण
उसे अपनी माटी की सतहों पर
ओढ़ चुके हैं
तुम चाहो तो लगा दो अपनी
आंखों के दर्पण से एक चिंगारी
लाल लाल लपटों की अग्नि में जल जलकर
हम वैसे भी हरी भरी हरियाली
से शीतल हो चले हैं।

मीनल

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