ग़ज़ल

प्यासे को’ देख आब पिलाते हुए चलो।
भूखा को’ई मिले तो’ खिलाते हुए चलो।

देखो कहीं अकेले’ न रह जाओ’ भीड़ में।
अपने कदम, सभी से’ मिलाते हुए चलो।

कुछ जिन्दगी में’ यार बड़े ख्वाब तो बुनो।
मत वो फ़टी कमीज़ सिलाते हुए चलो।

बे ज़र मिलें ज़नाब कभी या फ़कीर ही।
घर आसरा सभी को’ दिलाते हुए चलो।

मंजिल मिले बिना न रुको राह में कभी।
जूते जो’ फट गए हों’ सिलाते हुए चलो।

 

-आनन्द अमित

यूँ तो हसीन एक ये’ बन जाए’गी ग़ज़ल।
अपनी सुख़न “अमित” न हिलाते हुए चलो।

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