आते होगे साजन मेरे॥

कागा नित दरवाजे पर मेरे॥
काव कांव जब करता है॥
आते होगे साजन मेरे॥
मन उमंगें भरता है ||

सज धज कर मै राह निहारू ||
हो जाती है शाम ||
काम काज में मन नहीं लगता॥
ना छाँव लगे न घाम ||
बीते पल को सोच सोच कर ||
सूरज यूं ही ढलता है॥
आते होगे साजन मेरे॥
मन उमंगें भरता है ||

फोन की घंटी जब बजती है॥
दौड़ लगा के जाती हूँ॥
आवाज सुनती हूँ औरो की जब ||
रोती वापस आती हूँ ||
आस का दीपक मन मेरा है॥
रात दिना जो जलता है ||
आते होगे साजन मेरे॥
मन उमंगें भरता है ||

सासू जेठानी ननद देवरानी॥
सब कोई मारे ताना॥
ससुर हमारे बक बक करते॥
जल्द बनाओ खाना॥
सुन सुन बाते मन व्याकुल है॥
कब होगा साजन आना॥
लगता नहीं है दिल यहाँ पे॥
मन मौके जाने को करता है ||
आते होगे साजन मेरे॥
मन उमंगें भरता है ||

शम्भू नाथ कैलाशी

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शम्भनाथ

पिता का नाम स्वर्गीय श्री बाबूलाल गाँव कलापुर रानीगंज कैथौला प्रतापगढ़ उत्तर-प्रदेश जन्म ०७/०८/१९७४ शिक्षा परानास्तक पुस्तकालय विज्ञानं पेसा नौकरी

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