अर्पित

आज मैं खुश हूं
बहुत खुश हूं
दर्पण भी सहमत
बहुत खुश हूं
रोई नहीं पिछली कई रातों से
सोई नहीं ख्वाबों की बरसातों में
लबों पे मुस्कान की कली
खिली है
धूप की सुनहरी किरण भी
अब तो खिले मेरी गली
है
कोई तो कारण
बहुत हंसी हूं
कोई तो मौसम की करवट
बहुत खिली हूं
कोई तो छंटा अंधेरा
बहुत चमकी हूं
कोई तो घटा सांवरी
बहुत बरसी हूं
कोई तो किनारा
बहुत भटकी हूं
कोई तो टिमटिमाया
किस्मत का सितारा
बहुत टूटी हूं
कोई तो जीने का मकसद
बहुत घुट घुटकर मरी हूं
कोई तो दर्पण के सागर में
तर्पण
जीवन पर्यन्त
बहुत अर्पित हुई हूं।

मीनल

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