अहसास

सुबह सुबह
नंगे पांव
समुंदर किनारे सैर
यह रेत के गीलेपन को छूने
का अहसास कुछ अलग था
यह मेरी खुशनुमा
भीगी पलकों में कैद
यादों के अहसास जैसा था
किसी को खोना फिर
किसी को पाने की चाहत
जैसा था
किसी अजनबी के पहले से
बने पदचिन्हों में फिर से
अपने पांव को धसाने जैसा था
अपने ही किसी के दिल के
करीब और उसकी रूह में
समाने जैसा था
जिन्दगी में सबकुछ खोकर
सबसे बिछड़कर
सबकुछ बिखरा हुआ
सबकुछ उजड़ा हुआ
सबकुछ कांच के बुरादे सा
चकनाचूर
सबकुछ टूटा हुआ
सबकुछ बेजान
सबकुछ हारा हुआ
सबकुछ छिना हुआ
सबकुछ आत्मसम्मान को
झकझोरता हुआ
एक बुरा स्वप्न
एक डूबती आशा की नैय्या
एक उजड़ा चमन
एक बुझता चिराग
एक खोया वजूद
और उसे पुनः स्थापित
करने जैसा था।

मीनल

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