आगाज

बचपन में जो
थामी
हाथ की नाजुक अंगुलियों में
एक कलम तो
उसने मेरा जीवन बदल दिया
आगाज हुआ
क ख ग घ से
अ आ इ ई से
ए बी सी डी से
अलिफ बे पे ते टे से
अक्षरों ने फिर रूप लिया
शब्दों का
शब्दों ने वाक्यों
का
वाक्यों ने काव्य का
कविताओं का
कहानियों का
अनगिनित रचनाओं का
कागज, कलम, स्याही,
अहसास और न जाने
कितने मोती
दिल के खजाने से निकलकर
बिखरते हैं कागज पर
या जहां कहीं इन्हें जगह
मिल जाये
कुछ मेहर तो होती है
खुदा की भी
सबकुछ सौ फीसदी इंसानी
नहीं
जो कुछ बन जाये
बस वो कहीं किसी के
दिल को छूकर
उसके दिल में उतर जाये
तो दिल कहे वाह
और मेरी अंतिम सांस तक
चलते इस रचना संसार की
बात बन जाये।

मीनल

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