एक बच्चा था । उसका नाम नरेंद्र था । एक दिन वह काशी विश्वनाथ मंदिर में खेल रहा था । तभी वहाँ बंदरों का झुण्ड आ गया । उस झुण्ड में छोटे – बड़े सभी तरह के बन्दर थे ।

बालक नरेंद्र के पास थोड़े से चने थे । उन चनों को दिखाकर उसने बन्दर के बच्चे को अपने पास बुला लिया । छोटा बच्चा चने खाने लगा । बालक नरेंद्र उससे खेलने लगा ।लेकिन जैसे ही नरेंद्र ने उसे पकड़ा कि वह ची . ची . करके चिल्ला उठा । बंदर के बच्चे की वह आवाज बंदरों ने सुनी। वह तुरन्त उसकी रक्षा के लिए दौड़े । बंदरों का सरदार बड़ा लंबा चौड़ा और भयानक था । आगे – आगे नरेंद्र भाग रहा था । पीछे – पीछे बंदरों का सरदार । नरेंद्र ने बंदर के बच्चों को नहीं छोड़ा । वह मंदिर के अंदर जा छिपा। परन्तु बंदरों का सरदार वहाँ भी पहुँच गया । नरेंद्र फिर भागा। वह बड़ी तेजी से भाग चला। इसी बीच बंदर का बच्चा हाथ से छूटकर भाग निकला। लेकिन बंदरों का सरदार अभी भी उसका पीछा कर रहा था। शायद उसने छोटे बंदर को छूटकर भागते नहीं देखा था।

आखिर नरेंद्र किसी तरह भागता – छिपता गंगा किनारे पहुंचा। और पानी में कूद गया। बंदरों का सरदार अब मजबूर था । नरेंद्र काफी देर तक पानी में तैरता रहा। जब उसे लगा कि बंदरों का सरदार चला गया हे , तो वह किनारे पर आया, लेकिन पलक झपकते ही बंदर का सरदार फिर दाँत किटकिटाता हुआ ,नरेंद्र के सामने आ खड़ा हुआ ।

बस उसी क्षण नरेंद्र ने सोचा-” जो डर गया वह मर गया। ” उसने तुरन्त पास ही पड़ा नाव का मोटा डंडा उठा लिया । वह भरपूर ताकत से बन्दर सरदार को मारने ही वाला था कि वह डरकर भाग खड़ा हुआ ।

यह साहसी बालक नरेंद्र ही बड़ा होकर स्वामी विवेकानंद बने सारे संसार को ज्ञान से प्रकाशित किया । ‘अमेरिका के सर्व धर्म सम्मलेन ‘ में उनके भाषण ने धूम मचा दी थी ।

– सूरज कुमार मिश्रा

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