अंतहीन

शाम का धुंधलका
कोहरे की चादर
आंखों से ओझल होते दृश्य
और मेरे दिल से दूर भागता
मेरा ही साया
मैं खुद के अस्तित्व से कभी
परिचित थी
पर अब हूं अपरिचित
अंजान
अबोध
एक अजनबी सी प्रतीत होती है
मुझे मेरी वास्तविकता
यह अंतर्मन का सफर
होता है
बड़ा ही विचित्र
जिसमें खुद को पाने में
व्यक्ति खुद ही कहीं खो जाता है
खुद को ही कहीं ढूंढने लगता है
खुद को ही कहीं बिसराता है
खुद से ही विमुख हो जाता है
संसार को अपने ही समान
एक बिंदु पे सिमटता
खड़ा पाता है
यह अंतरात्मा की
यात्रा है अंतहीन
कहीं कोई पड़ाव नहीं है
बस रोशनी ही रोशनी है
चारों तरफ
और उसमें गुम होते साये
अपने और परायो के बीच
कोई फर्क नहीं
सब काया एक समान
सब छवियां एक समान
सब चेहरे एक समान
मैं भी उन्हीं का अंग हूं
चरित्र हूं
पहचान हूं
अगर वो बेहिचक
पूरी रजामंदी से
अपनाये मुझे
नहीं तो इस अंतहीन
सड़क पे भटकता
एक साया भर हूं मैं
न मेरी कोई मंजिल है
न हमराही
न सामान
बस इस संसार में
सांस ले रहे किसी जीवन का
मैं एक कण मात्र हूं
यही मेरी अभिलाषा
यही मेरा जीवन
यही मेरी कहानी
यही मेरा परिचय
यही मेरी यात्रा
यही मेरा व्यक्तित्व
यही मेरी पहचान
यही मेरा अंतहीन
आगाज और अंजाम।

मीनल

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