जब रक्षक हीं भक्षक बन जाए

तुम्हें चाहिए क्या आजादी , सबपे रोब जमाने की ,
यदि कोई तुझपे तन जाए , तो क्या बन्दुक चलाने की ?
ये शोर शराबा कैसा है ,क्या प्रस्तुति अभिव्यक्ति की ?
या अवचेतन में चाह सुप्त है , संपुजन अति शक्ति की .
लोकतंत्र ने माना तुझको , कितने हीं अधिकार दिए ,
तुम यदा कदा करते मनमानी , सब हमने स्वीकार किए .
हाँ माना की लोकतंत्र की , तुमपे है प्राचीर टिकी ,
तेरे चौड़े सीने पे हीं तो , भारत की दीवार टिकी .
हाँ ये ज्ञात भी हमको है , तुम बलिदानी भी देते हो ,
हम अति प्रशंसा करते है , कभी क़ुरबानी भी देते हो .
जब तुम क़ुरबानी देते हो , तब तब हम शीश नवाते हैं ,
जब एक सिपाही मर जाता , लगता हम भी मर जाते हैं .
पर तुम्हीं कहो जब शक्ति से , कोई अनुचित अभिमान रचे ,
तब तुम्हीं कहो उस राष्ट्र में कैसे ,प्रशासन सम्मान फले.
और कहाँ का अनुशासन है , ये क्या बात चलाई है ?
गोली अधिवक्ताओं के सीने पे, तुमने हीं तो चलाई है.
हम तेरे भरोसे हीं रहते , कहते रहते तुम रक्षक हो ,
हाय दिवस आज अति काला है , हड़ताल कर रहे तक्षक हैं ,
एक नाग भरोसे इस देश का , भला कहो कैसे होगा ?
जब रक्षक हीं भक्षक बन जाए , राम भरोसे सब होगा.

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AJAY AMITABH SUMAN

जीवन में बहुत सारी घटनाएँ ऐसी घटती है जो मेरे ह्रदय के आंदोलित करती है. फिर चाहे ये प्रेम हो , क्रोध हो , क्लेश हो , ईर्ष्या हो, आनन्द हो , दुःख हो . सुख हो, विश्वास हो , भय हो, शंका हो , प्रसंशा हो इत्यादि, ये सारी घटनाएं यदा कदा मुझे आंतरिक रूप से उद्वेलित करती है. मै बहिर्मुखी स्वाभाव का हूँ और ज्यादातर मौकों पर अपने भावों का संप्रेषण कर हीं देता हूँ. फिर भी बहुत सारे मुद्दे या मौके ऐसे होते है जहाँ का भावो का संप्रेषण नहीं होता या यूँ कहें कि हो नहीं पाता . यहाँ पे मेरी लेखनी मेरा साथ निभाती है और मेरे ह्रदय ही बेचैनी को जमाने तक लाने में सेतु का कार्य करती है.

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