अपेक्षा

मैं बस एक फूल भर नहीं
अपितु एक रुपहले सपनों का
संसार हूं
मैं फिजा में रंग बिखेरता हूं
मैं हवाओं में अपने तन की खुशबू
लिये
घुलमिल जाता हूं
मैं जाने अंजाने वातावरण को
सुगंधित बनाता हूं
मैं महत्वपूर्ण हूं
मेरे में आकर्षण है
मैं न हूं तो यह बाग
सौंदर्य विहीन है
लेकिन मैं अभिमानी नहीं
भली भांति परिचित हूं
मनुष्य और प्रकृति की विकृत
मानसिकता से
तोड़ लेंगे मुझे बेरहमी से
बिना कुछ सोचे विचारे
चढ़ा देंगे मुझे भेंट स्वरूप
किसी मंदिर में
किसी धर्म कर्म के अन्य कार्यों में
तेज आंधियां मेरे अस्तित्व को
पल भर में ध्वस्त कर देंगी
किस दिशा में कहां तक
बहाकर ले जायेंगी
कहां पटकेंगी
यह जानने के लिए
तब तक मैं भी जिन्दा
नहीं रहूंगा
क्या अच्छा हो
जब तक मैं हूं
मेरा सौंदर्य निहारो
मेरे तन पे अपना
हाथ फिराकर
मुझे दुलारो
अपना प्यार मुझपे लुटा दो
इसके बदले तुम जो पाओगे
वो अकल्पनीय होगा
मैं अपनी क्षमता से अधिक
अपना सर्वस्व तुम पर लुटा दूंगा
तुम दुनिया के पदचिन्हों का
अनुसरण मत करो
तुम अपने अंदर कोमलता
का भाव जगाओ
करुणा से परिपूर्ण हो जाओ
मुझे बिना तोड़े अपना
काम चलाओ
अपनी क्षणिक
संतुष्टि के लिये
दूसरे का सर्वनाश मत करो
जिस तरह के व्यवहार की खुद से
अपेक्षा करते हो
उसका पूर्ण नहीं तो कुछ
एक अंश तो दूसरे के
साथ प्रयोग में लाओ
खुद का जीवन जैसा चाहते हो
वैसा दूसरे का भी तो बनाओ।

मीनल

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