बंदिश

मेरे जिस्म की कैद में
मेरी रूह का परिंदा
फड़फड़ाता बैठता है
कभी इस डाल
कभी उस डाल
रेत पे पड़ रही परछाइयां भी हैं
अंधेरी
घुटन भरी
पांव धंस रहे जमीन में
जिस्म के लिबास के घर का पता
मालूम नहीं
जिस्म की बंदिश में
जिस्म को रूहानियत का भी
थोड़ा बहुत अहसास है
दिल की खिड़की खोल
जिस्म के दरवाजे से बाहर
रूह की रूहानियत आसमां तक
फैलती आंख से बाहर
झांकती है जब कभी।

मीनल

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