पासा किस्मत का

हाथ से पासा फेंककर
देखती हूं
किस्मत का
बात बनती है कि नहीं
खुदा की निगाह तो लगती है
सीधी
फिर भी देखूं जिन्दगी की
तकदीर संवरती है कि नहीं
उम्र के एक ऐसे पड़ाव पर हूं कि
आगे बढ़ जाऊं
तो बेहतर
न बढ़ पाऊं
तो भी ठीक
पीछे लौटने का तो प्रश्न ही
नहीं उठता
वहीं उसी मोड़ पे खड़ी रहूं तो भी
क्या बुरा है
इतने हौसलों का दम
भर भर के जो
इस बिंदु तक का सफर तय
किया है
वो क्या कम है
पासे फेंकते रहें उम्र भर
सफल होना या
असफल होना
यह तो भाग्य की निशानी है
किसी की मानसिक स्थिति को
दर्शाती एक अनबुझ कहानी है
समाज द्वारा किसी मनुष्य को
नापने का यह तो महज एक पैमाना मात्र
है
सच तो यह है कि
सांस की लय पे नाचते
जीवन की लीला खत्म होते
ही यह किस्मत का खेल
जमीं पे अधमरे पड़े
पासे की तरह खत्म
होना निश्चित है।

मीनल

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