कहीं न जाये

मीठी बातें चाशनी सी तेरी
चाँदनी में धुला रूप
सौंदर्य की तू अनुपम प्रतिमा
हर भंगिमा तेरी मोहक,
अप्रतिम, गंभीर
तन से लिपट लिपट जाये
मन में सिमट सिमट जाये
तन मन में रचबस जाये
शक्कर सी घुलमिल जाये
मीठी रस की फुहार सी
उज्जवल सफेद धारा में
नहाई प्यार सी
प्रेम की एक अंतहीन
नदी सी
नदी में हिलोर खाती
हर लहर की एक धार सी
एक तरंग सी किनारे से
टकराये
बिजली की तेजी से पलट
के लौटे
हिरणी की चाल की तीव्र
गति सी
भाग जाये
लुप्त हो जाये
हाथ न आये
दूर कहीं खो जाये
स्मृतियों के अमिट चिन्हों सी
पर हृदय में
एक ताजा याद सी
हर रोज आकाश में
उगते सूरज
बादलों में उमड़ती गर्जना सी
बारिश में तन को भिगोती
फुहार सी
फूलों के रस
कलियों की खुशबू
गजरे के श्रृंगार
उपवन के दुलार सी
मन से कहीं न जाये।

मीनल

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This Post Has One Comment

  1. superb….

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