आसमां का परिंदा

रंग भर दो
आसमां में
बेशुमार
कि आसमां को लगने लगा है कि
उसमें रंगों की कमी है
लपेट दो उसके जिस्म को
प्यार के सतरंगी आंचल से
कि उसे आजकल लग रहा है कि
उसके लबों पे मुस्कुराहट कम और
आंखों में बसी नमी अधिक है
खामोश है
भाषा का संवाद बंद है
न गरज रहा है
न बरस रहा है
बादल उसे छोड़ उड़ गये हैं
दूर देश कहीं
आंखों की कोई परिभाषा समझे
और दिल की अभिलाषा
रूह से रूह का जो बंधन जोड़े
जमीं से आसमां को नापता
आसमां से समुन्दर में
झांकता
गहरे स्थाई संबंधों का जाल फैलाता
एक मानव के हृदय की
चरम संवेदनशीलता से भरा
कोई परिंदा ढूंढ रहा है वो।

मीनल

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