यकीन नहीं होता

यकीन नहीं होता मैं लेखक कैसे बना हूँ?बनना चाहता था अधिकारी, पर कलम कैसे पकड़ लिया हूँ

शायद,यही लिखा था और नियति को यही मंजूर था, वरना प्रशासन और राजनीतिक में रुचि रखने वाला को साहित्य कब मंजूर था?

शायद,यही होता है हर किसी की जिंदगी में, करना चाहते हैं और,पर अक्सर कुछ’और’हो जाता हैं जिंदगी में :कुमार किशन कीर्ति,बिहार

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Kumar kishan kirti

युवा शायर,लेखक

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