अडिग अहसास

तुम कोमल तो
मैं कोमल
तुम कठोर तो
मैं कठोर
तुम कोई दर्पण नहीं जिसमें मैं
अपना रूप साफ साफ देख सकूं
और न ही
मैं कोई शीशा हूं जिसमें तुम अपनी छवि
भली भांति देख पाओ
मेरी अच्छाई का कोई ओर छोर नहीं है
तुम्हारी बुराई की कोई सीमा नहीं है
मैं एक कोरी दीवार हूं जिसपे छींटे
अलग अलग रंगों के पड़ते हैं
फिर भी
अभी भी कोरी हूं मैं
आखिरी श्वास तक
रहूंगी भी क्योकि
मैं जो हूं
उसके होने पे विश्वास करती हूं
लोगों के नजरिये या
उनकी निरंतर बदलती सोच से
पल पल अपने रंग बदलती नहीं
अपनी पहचान बदलती नहीं
अपना व्यक्तित्व बदलती नहीं
मुझे अपने रूप पे विश्वास है
अपने रंग पे ऐतबार है
अपने सपनों की उड़ान पे भरोसा है
मेरे कण कण में प्रभु का वास है
यह अडिग अहसास है।

मीनल

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