घर की रौनक बेटियां

किसी भी पिता क़ा अभिमान होती है बेटियां

किसी भी पिता क़ा स्वाभिमान होती है बेटियां

जिस घर मे बेटी ना हो वो वीरान नजर आता है

जिस घर मे बेटी ना हो वो घर श्मशान नजर आता है

घर के कामों मे वो माँ क़ा हाथ बंटाती है

अपने माँ-बाप क़ी खुशी के लिए वो कुछ भी कर जाती है

दिल क़ी बहुत मासूम होती है बेटियां

फूल से भी नाजुक होती है बेटियां

कलयुग मे उस बेटी को दहेज के दानवों द्वारा जलना भी पड़ता है

उस निर्दोष क़ा क्या दोष जिसे कोख मे मरना पड़ता है

कभी हिमा दास तो कभी कल्पना चावला बन कर वो देश क़ा मान बढ़ाती है

तो कभी रानी लक्ष्मीबाई बनकर देश पर प्राण न्यौछावर कर जाती है

लेकिन ये कैसी हवा चली है ये दरिंदे कहाँ से आए

बेटियों क़ी अस्मत से जो खेल रहे क्यों ना इनको गोली मारी जाए

देश के कर्णधार तुम अब संविधान बदल दो

हर बलात्कारी जिंदा जल जाए इस समस्या क़ा बस यही हल कर दो

बेटियों को आगे बढ़ने से कभी ना रोको

वो तेरा ऊँचा नाम करेगी उसको पढ़ने से कभी ना रोको

ये ओमप्रकाश कहे बेटे से ज्यादा वो तेरी देखभाल करेगी

जब भी तुम उसको पुकारोगे वो तब तेरे पास में होगी

अब भी समझो तुम बस इतनी सी छोटी बात को

कोख में बेटी को ना मारो तुम समझो मेरे जज्बात को

रचना-ओमप्रकाश झा

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This Post Has One Comment

  1. अति सुन्दर

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