शाक्यमुनि गौतम बुद्ध का मूल ज्ञान विपश्यना लेखक राहुल शास्त्री खदिया नंगला

शाक्यमुनि गौतम बुद्ध का मूल ज्ञान विपश्यना लेखक राहुल शास्त्री खदिया नंगला

🌷🌷🌷नमो बुध्दाय🌷🌷🌷

🌷कर्म संस्कार 🌷

पाप के गहरे संस्कार जन्म जन्मांतरों तक हमारे शत्रु की तरह साथ लगे रहते हैं, और दुखद स्थितियां पैदा करते रहते हैं।
इसी प्रकार गहरे पूण्य संस्कार हमारे मित्र की तरह जन्म जन्मांतरों तक चित्तधारा के साथ लगे रहते हैं और हमारी सहायता करते हैं, सुखद फल देते हैं। संकट में हमारी रक्षा करते हैं।

🍁इसी को किसी कवि ने ठीक ही कहा-
वन में, रण में, शत्रुओ में, जल या अग्नि के बीच में, समुद्र में या पर्वत शिखर पर अथवा सोये हुए असावधान रहते हुए अथवा विषम परिस्थिति में पड़े हुए व्यक्ति की पूर्व जन्म के पूण्य रक्षा करते हैं।

🌻ये पूण्य अथवा पाप कर्मो के संस्कार साथ कैसे रहते हैं, इसे भी समझो।
संस्कारो को जीवन की चित्तधारा अपने साथ लिये चलती है।
ये कर्म संस्कार कोई ठोस पदार्थ नही है।कर्म संस्कार तरंगो के रूप में चित्तधारा की तरंगो से सम्मिश्रित हो जातें हैं और सम्पूर्ण चित्तधारा को प्रभावित करते रहतें हैं।शरीर को प्रभावित करते रहते हैं।शरीर और चित्त की मिली-जुली जीवनधारा को प्रभावित करते रहते हैं।
अच्छे-बुरे कर्म संस्कार चित्त का अच्छा या बुरा स्वभाव बनाते हैं।

🌺यह कर्म संस्कारो की ऊर्जा(energy) ही है जो जीवनधारा को अच्छाई या बुराई की और धकेलती हुई आगे बढ़ाती है।
जब जीवन का अवसान(death) होता है तब शरीर चित्त की धारा के साथ चलने में असमर्थ हो जाता है तो दोनों का अलगाव(separation) होता है। इसी को मृत्यु कहते हैं।

🌷चित्त की चेतना से अलग हुआ मुर्दा शरीर विसरनखलित (decompose) होता रहता है।शरीर से अलग हुई चित्तधारा किसी अन्य शरीर से तत्काल जुड़कर प्रवाहमान होने लगती है। इसी को पुनर्जन्म कहते हैं।

🌼प्रत्येक जीवन में हलके और भारी, अच्छे और बुरे संस्कार बनते ही रहते हैं।निसर्ग के यानि धर्म के नियम इतने परफेक्ट और वेल आर्गनाइज्ड है कि एकाउंटिंग सिस्टम के सॉफ्टवेयर की तरह अच्छे या बुरे कर्म संस्कार पूण्य और पाप के खाते में अपने आप निवेशित होते जाते है।और जीवन में जिस जिस कर्म का फल प्रकट होकर उसका भुगतान हो जाता है वह उस अकाउंट में डेबिट हो जाता है। यानी समाप्त हो जाता है।
प्रतिक्षण की बैलेंस शीट तैयार रहती है।इस जीवन के अंतिम क्षण के समय चित्तधारा के पाप-पूण्य की जो बैलेंस शीट है, अगले जीवन के प्रथम क्षण में इसी बैलेंसशीट के साथ चित्तधारा आगे बढ़ती है।
शरीर की चयुति हो गयी, किन्तु चित्तधारा चलती रही।
नए शरीर के साथ जुड़ते ही तत्काल चल पड़ी। बीच में एक क्षण का भी गैप नही होता।

🌼पिछले जन्म की चित्तधारा का प्रवाह नए जन्म में वैसे ही चलना आरम्भ हो जाता है और उसके साथ आ रही पाप-पूण्य की बैलेंसशीट में उसी प्रकार पाप-पूण्य क्रेडिट-डेबिट होते रहते हैं।
यों जीवनधारा एक से दूसरे जन्म मे चलती रहती है।

💐वस्तुतः संस्कार है तो जीवनधारा है।चित्त सारे संस्कारो से मुक्त हो जाए तो नया जीवन ही न हो सके।जन्म मरण के चक्कर से छुटकारा हो जाए। पर संस्कार कायम है इसलिये एक जन्म के बाद दूसरा जन्म होता है।

🌸जीवन के साथ ख़त्म होते ही उसके साथ संस्कार ख़त्म नही हो जाते।परंतु संस्कार ख़त्म हो जाय तो जीवनधारा समाप्त हो जाती है। अगला जन्म नही हो पाता।

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🌹गुरूजी, आप अपने प्रवचनों में बतलाते हैं कि कर्मफल संवेदना के रूप में आता है। यह बात समझ में नही आयी। क्योंकि संवेदना तो शरीर का स्वभाव है, कई कारणों से आ सकती है।तो फिर उनको पिछले कर्मो का फल क्यों मानें?

उत्तर–जरुरी नही है। सारी संवेदनाएँ कर्म-संस्कारो की द्योतक नही हैं।
भगवान बुद्ध ने संवेदनाओ की उत्पत्ति के कई कारण बताएं हैं, उनमे से एक ये कर्म-संस्कार हैं।
किन्तु जब आप ध्यान करते हो तब ज्यादातर कर्म-संस्कार संवेदनाओ के रूप में प्रकट होने के द्योतक हैं। अन्यथा तो जो आपने भोजन किया है या आपकी बीमारी के कारण कोई दर्द है या चलते हुए कहीं कोई ठोकर लग जाने से कोई पीड़ा हुई- इसमे पुराने संस्कारो से क्या मतलब है? यह सब नए संस्कार हैं।

🌻हम असावधानी से चले, ठोकर लग गयी। हमने कोई गलत भोजन कर लिया, उसकी वजह से पेट दुखने लगा; यह नया कर्म है हमारा।
तो सारी संवेदनाएँ हमारे पुराने संस्कारों की हों ऐसा मानकर नही चलें।

🌷हमें तो यह देखना है कि किसी भी कारण से संवेदना आयी, कारण कोई भी हो, किसी भी प्रकार की संवेदना महसूस कर रहें हो, हम तो समता में हैं, कोई नया संस्कार नही बना रहें हैं।

🌺नया नही बना रहें हैं तो पुराने का संवर्धन होना बंद हो गया, अन्यथा संवर्धन होता चला जाता है।

🌲संवेदना इस कारण से हो या उस कारण से- आप यदि समता में स्थित हो, कोई प्रतिक्रिया नही कर रहे, और नया कर्म-संस्कार नही बना रहे तो आपका उद्देश्य सध गया और आप प्रगति कर रहें हैं।

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Que : जो पुराने कर्म संस्कार हैं वे वास्तविक कर्मो के रूप में सामने आते हैं या संवेदना के रूप में?

Ans : –हम जो भी कर्म करते हैं वह चित्त में चेतना क्या जागी उससे होता है।

मन में द्वेष जागा, क्रोध जागा, वासना जागी, भय जागा तो ही शरीर या वाणी से कर्म हुआ।

ये विकार जागते हुए शरीर में क्या संवेदना हुई? जिस प्रकार की संवेदना से वह कर्म किया गया उसी प्रकार की संवेदना जागेगी।

हम ठंडे स्थानों में शिविर देतें हैं। लोग ठंड से थरथराते हैं, लेकिन जब विपश्यना के बाद गर्मी फूटती है तो कपडे फेंकने लगते हैं। यह गर्मी शरीर की गर्मी नहीं, मौसम की भी नहीं– भीतर के संग्रहित (accumulated) संस्कार के कारण है।

क्रोध का जितना संस्कार इकट्ठा किया वह गर्मी पैदा करेगा।

ईर्ष्या (jealousy)का होगा- गर्मी पैदा करेगा।

🌷 और न जाने कितने प्रकार के संस्कार हैं कोई गर्मी पैदा करेगा, कोई धड़कन पैदा करेगा।
जाते समय जो कुछ पैदा किया- उसी के साथ निकलेगा।

कांटा जैसे जितना कष्ट देकर घुसा था उसी तरह उतना कष्ट देकर ही निकलेगा।उसका स्वभाव है।

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🌷सही सुख🌷

गुरूजी– चित्तधारा को आगे बढ़ने के लिए प्रतिक्षण आहार चाहिए। नया संस्कार एक आहार है, पुराने संस्कारो का फल दूसरा आहार है। इन दोनों में से कोई ना कोई आहार मिलता है तो यह चित्तधारा आगे बढ़ती है।

🌹बहुधा(mostly) होता यह है की चित्तधारा को जब हम एक आहार देतें है, एक नया संस्कार डालते हैं तो रुकते नही। अगले क्षण फिर वैसा ही आहार देतें हैं। यों क्षण प्रतिक्षण आहार देतें चलते हैं।
किसी बात को लेकर क्रोध आया तो बड़ा नन्हा सा क्षण होता है क्रोध का, पलक झपकने मात्र में कितने ही शत- सहस्त्र कोटि बार उत्पन्न होकर नष्ट होने वाला क्षण। लेकिन क्रोध का संस्कार पैदा करते ही अगले क्षण फिर क्रोध पैदा किया। अगले क्षण फिर क्रोध ही क्रोध के सँस्कार इस चित्तधारा को देर तक आगे बढ़ाते चलतें हैं। कभी तो घंटो क्रोध चलता रहता है।
क्रोध रुका तो कोई और संस्कार बनाना शुरू कर देंगे। वह चलेगा देर तक। फिर कोई और। कभी भय। कभी वासना। कभी कुछ और।
यों पुराने संस्कारो के नष्ट होने की बारी ही नही आती।
क्षण-क्षण नया ही बनाये जा रहें हैं।

🌼यदि हम संवर कर लें यानी रोक लगा दें तो नए संस्कार नही बनते। तब चित्तधारा किसके बल पर चलती है? क्योंकि हमने नया संस्कार नही बनाया, तो कोई न कोई संस्कार- बीज जिसका फल हो सकता है, कुछ देर बाद आने वाला हो, अब जल्दी पककर आएगा। इसे विपाक का त्वर्तिकरण कह सकते हैं। तुरंत कोई पुराना कर्म-संस्कार चित्तधारा पर अपना फल लेकर आता ही है। यही उदिरणा है।

🌺आया कोई पुराना कर्म-संस्कार चित्त-धारा पर अपना फल लेकर और उसके सहारे चित्त धारा आगे बढ़ने लगी। जैसा कर्म था वैसा ही फल आया। हम उसे समता से, प्रज्ञा से देखने लगे तो हुआ निरोध उसका। जितने जितने पुराने संस्कार क्षीण होते चले जायेंगे उतना उतना हल्कापन आएगा ही। सही माने में सुख आएगा। दुःखो से छुटकारा होगा।

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🌷कर्म- विपाक🌷

विपश्यना साधना में जहाँ एक कर्म-विपाक का समूह उदीर्ण हुआ और प्रज्ञापूर्वक उसे क्षय कर लिया, वहां दूसरे कर्म- फलो का समूह तत्क्षण प्रकट होगा।

यों एक के बाद एक पुराने कर्मो के विपाक का ताँता लग जाता है। विपश्यना के प्रज्ञा- यज्ञ में उनकी आहुति लगती जाती है।यह क्रम जितनी देर तक चलता है, उतनी देर तक खिणन पुराणं होता रहता है।

परंतु जब कोई कर्म- विपाक अत्यंत घनीभूत पीड़ा के रूप में प्रकट होता है तो साधक की सारी सिट्टी- पिट्टी गुम हो जाती है, विद्या विलीन हो जाती है, प्रज्ञा क्षीण हो जाती है। पीड़ा के प्रति अम्मतव- भाव रख ही नहीं पाता। बौद्धिक स्तर पर भले अनित्य अनित्य करता रहे, परंतु वास्तविक स्तर पर ममत्व आ जाने के कारण उसे दूर करना चाहता है, और चाहने से वह दूर होती नहीं। अतः लगता है की यह तो नित्य है।

उस स्थूल ठोस पीड़ा की घनसंज्ञा नष्ट कर, सूक्ष्म प्रकम्पन की अनुभूति प्रज्ञामयी विपश्यना साधना के अभ्यास द्वारा ही होती है, जैसे कोई धुनिया कपास(रुई) की ग्रंथि को अपने धुनके के तार से प्रकम्पित कर खोलता है, कपास का एक एक तार अलग अलग कर देता है।

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🌹गुरूजी, अगर आदमी आदमी में भेद नही मानना चाहिये तो एक व्यक्ति दूसरे से दिखने में, स्वभाव आदि में अलग अलग क्यों होता है? निसर्ग सबको एक जैसा क्यों नही बनाती? निसर्ग तो भेद भाव करती नही न।

उत्तर–नही, निसर्ग कोई भेदभाव नही करता।

प्रकर्ति हमारा स्वभाव नही बनाती।

हर व्यक्ति अपनी समझदारी या नासमझी से अपना अच्छा या बुरा स्वभाव बनाता है।और स्वभाव बनाने का यह क्रम इसी एक जीवन का नही है, अनेक जन्मों से चला आ रहा है। पूर्व जन्मों का स्वभाव इस जन्म के स्वभाव को प्रभावित करता है।

🌷परंतु यदि समझदार व्यक्ति अंतर्मुखी होकर अपने स्वभाव की जड़ो तक पहुँच कर अपने स्वभाव को बदलने का प्रयत्न करे तो बदल सकता है।

प्रकृति तो प्रत्येक व्यक्ति द्वारा अपने स्वभाव के अनुसार किये गए अच्छे बुरे कर्म का फल देती है। इसमे वह रंच मात्र भी भेदभाव नही करती।

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🌹गुरूजी, जब कर्म का फल आनेवाला होता है तो विपश्यना उसे कैसे काट सकती है?

उत्तर–कर्म आएगा फल लेकर तो पहले संवेदना आएगी। संवेदना देखने लगेंगे तो जो फल आएगा वह दुर्बल हो जायेगा।
पेड़ में फल तो आया पर बड़ा ही नही हुआ, छोटा सा होकर गिर गया।
यही तो भगवान् बुद्ध ने ढूंढ निकाला। यही विद्या तो उन्होंने सीखी और लोगो को सिखाई।

🌷जो भी हमने सत्कर्म दुष्कर्म किया है उसका फल तो आएगा ही। हमने संवेदना के रूप में उसे देखना शुरू कर दिया तो उसकी ताकत ख़त्म हो जायेगी।
मान लो बड़ा फल आया भी तो कुछ नही होगा।हम मुस्कराते रहेंगे, आ भई आ!
जैसे किसी ने हमारा कुछ छीन लिया, ले लिया, तो क्या हुआ!
हम तो मुस्कुराते रहेंगे।
हमारे अच्छे कर्मो के अच्छे फल भी तो मिलेंगे। तो दुखी न होकर हमेशा प्रसन्न रहो।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा खदिया नगला
🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻

राहुल सिंह बौद्ध

– 🌷कर्म संज्ञा🌷

पाप के गहरे संस्कार जन्म जन्मांतरों तक हमारे शत्रु की तरह साथ लगे रहते हैं, और दुखद स्थितियां पैदा करते रहते हैं।इसी प्रकार गहरे पूण्य संस्कार हमारे मित्र की तरह जन्म जन्मों तक तक चित्ताइड के साथ लगे रहते हैं और हमारी सहायता करते हैं, सुखद फल। दे रहे हैं। संकट में हमारी रक्षा करते हैं। ये पूण्य या पाप कर्मो के संस्कार के साथ कैसे रहते हैं, इसे भी समझो.संस्कारो को जीवन की चित्तव्य अपने साथ के लिए चलती है।ये कर्म संस्कार कोई ठोस पदार्थ नहीं।मान संस्कार तरंगो के रूप में चित्ताइड की तरंगो से सम्मिश्रित हो जातें हैं। और सम्पूर्ण चित्तदी को प्रभावित करते रहतें हैं।शरीर को प्रभावित करते रहते हैं।शरीर और चित्त की मिली-जुली जीवनधारा को प्रभावित करते रहते हैं।अच्छे स्कार-बुरे कर्म संस्कार चित्त का अच्छा या बुरा स्वभाव बनाते हैं।🍁इसी को किसी कवि ने ठीक ही कहा-वन में, रण में, शत्रुओ में, जल या अग्नि के बीच में, समुद्र में या पर्वत शिखर पर या सोये हुए असावधान रहते हुए या विषम परिस्थिति में ग्रस्त हुए व्यक्ति की पूर्व जन्म के पून्य रक्षा करते हैं।🌻🌺यह कर्म संस्कारो की ऊर्जा (ऊर्जा) ही है जो जीवनदीप को अच्छाई या बुराई की और धकेलती हुई आगे बढ़ाती है।जब जीवन का अवसान (मृत्यु) होती है तब तब शरीर चित्त की धारा के साथ चलने में असमर्थ हो जाता है – दोनों पक्षों का अलगाव (अलग होना) होता है। इसी तरह मृत्यु को कहते हैं।🌷चित्त की चेतना से अलग हुआ मुर्दा शरीर विसारनखित (विघटित) होता रहता है।शरीर से अलग हुए चित्तविद किसी अन्य शरीर से तत्काल जुड़कर प्रवाहमान होने लगता है। इसी को पुनर्जन्म कहते हैं।🌼प्रत्येक जीवन में हलके और भारी, अच्छे और बुरे संस्कार बनते ही रहते हैं ।निसग के यानि धर्म के नियम इतने पर प्रभाव और वेल आर्गनाइज्ड है कि शिक्षण प्रणाली के सॉफ्टवेयर की तरह अच्छे या बुरे कर्म संस्कार पूण्य और पाप के अपने अपने निवेशित होते हैं। जाओ.और जीवन में जिस पर कर्म का फल प्रकट होता है उसका भुगतान हो जाता है वह उस खाते में महत्वाकांक्षी हो जाता है। यानी समाप्त हो जाता है ।प्रतिनिधि की बैलेंस शीट तैयार रहती है। जीवन के अंतिम क्षण के समय चित्ताइड के पाप-पूण्य की जो बैलेंस शीट है, अगले जीवन के पहले क्षण में इसी बैलेंसशीट के साथ पुरातनदी आगे बढ़ती है। शीरीर की चुयुति हो गयी, किंतु चित्ताइड चलती रही.नए शरीर के साथ जुड़ते ही तत्काल चल पड़ी। बीच में एक क्षण का भी गैप नहीं होता।🌼पिछले जन्म की चित्तदी का प्रवाह नए जन्म में वैसे ही चलना आरम्भ हो जाता है और उसके साथ आ रही पाप-पूण्य की बैलेंसशीट में उसी प्रकार पाप-पूण्य क्रेडिट-चार्ट होते रहते हैं। जैसे जीवनदाय एक से दूसरे जन्म में नजदीक रहता है। 💐वस्तुतः संस्कार है तो जीवनदाय ।इयत से संस्कारो से मुक्त हो जाए तो नए जीवन ही न हो सके।जन्म मरण के चक्कर से छुटकारा हो जाए। पर संस्कार कायम है इसलिए एक जन्म के बाद दूसरा जन्म होता है। 🌸जीवन के साथ ख़त्म होते ही उसके साथ संस्कार ख़त्म नहीं हो जाते हैं ।परंतु संस्कार ख़त्म हो जाते हैं तो जीवनदायी समाप्त हो जाता है। अगला जन्म नहीं मिलता है। http://www.vridhamma.org/https://www.dhamma.org/en/courses/search———🌹गुरूजी, आप अपने प्रवचनों में बतलाते हैं कि कर्मफल संवेदना के रूप में आता है। यह बात समझ में नहीं आयी। क्योंकि संवेदना तो शरीर का स्वभाव है, कई कारणों से आ सकते हैं।तो फिर उनसे पिछले कर्मो का फल क्यों मान केंद्र। उत्तर-जरुरी नहीं है। सारी संवेदनाएँ कर्म-संस्कारो की द्योतक नहीं हैं।भगवान बुद्ध ने संवेदनाओ की उत्पत्ति के कई कारण बताएं हैं, उनमे से एक ये कर्म-संस्कार हैं।किन्तु जब आप ध्यान करते हैं तब ज्यादातर कर्म-संस्कार संवेदनाओ के रूप में प्रकट होने के द्योतक हैं। हैं। अन्यथा तो जो आपने भोजन किया है या आपकी बीमारी के कारण कोई दर्द है या आगे चलकर कहीं कोई ठोकर लग जाने से कोई दर्द हुआ- इसमे पुराने संस्कारो से क्या मतलब है? यह सब नया संस्कार हैं। हमें तो यह देखना है कि किसी भी कारण से संवेदना आयी, कारण कोई भी हो, किसी भी प्रकार की संवेदना महसूस कर रहें हो, हम तो समता में हैं, कोई नया संस्कार नहीं बना रहें हैं।🌻हम असावधानी से चले गए, ठोकर लग गयी। हमने कोई गलत भोजन नहीं किया, उसकी वजह से पेट दुखने लगा; यह नया कर्म है हमारा.तो सारी संवेदनाएं हमारे पुराने संस्कारों की ऐसी मानकर नहीं चलेंगी।🌷🌺नई नहीं बना रहें हैं तो पुराने का संवर्धन होना बंद हो गया है, अन्यथा पदोन्नति होती है।🌲संवेदना इस कारण से हो या उस कारण से- आप यदि समता में स्थित हो, कोई प्रतिक्रिया नहीं कर रहे हैं, और नए कर्म-संस्कार नहीं बना रहे हैं तो आपका उद्देश्य सध गया और आप प्रगति कर रहे हैं। ————————— ————————— क्यू: जो पुराने कर्म संस्कार हैं वे वास्तविक कर्मो के रूप में सामने आते हैं या संवेदना के रूप में? Ans: -हम जो भी कर्म करते हैं वह चित्त में चेतना क्या जागी उससे होता है।मन में द्वेष जागा। , गुस्सा जागा, वासना जागी, य जागा तो ही शरीर या वाणी से कर्म हुआ.ये विकार जागते हुए शरीर में क्या संवेदना हुई? जिस प्रकार की संवेदना से वह कर्म किया गया उसी प्रकार की संवेदना जागेगी।हम ठंडे स्थानों में शिविर देतें हैं। लोग ठंड से थरथराते हैं, लेकिन जब विपश्यना के बाद गर्मी फूटती है तो कपडे थने लगते हैं। यह गर्मी शरीर की गर्मी नहीं है,🌷और न जाने कितने प्रकार के संस्कार हैं कोई गर्मी पैदा करेगा, कोई धड़कन पैदा करेगा।जाते समय जो कुछ पैदा किया- उसी के साथ निकलेगा.कांटा जैसे जैसे कष्ट देकर घुसा था उसी तरह समान कष्ट देकर ही निकलेगा.श्रमित स्वभाव – ————————————- 🌷सही खुशी🌷 गुरुतजीत को आगे बढ़ना के लिए प्रतिक्षण आहार चाहिए। नई संस्कार एक आहार है, पुरानी संस्कारो का फल दूसरा आहार है। इन दोनों में से कोई ना कोई आहार मिलता है तो यह पर्टाइड आगे बढ़ती है।🌹बहुधा (ज्यादातर) होता है यह कीट्सटाइड को जब हम एक आहार देतें है, एक नई संस्कार डालते हैं तो रुक नहीं सकते। अगले क्षण फिर वैसा ही डायरी देतें हैं। यों क्षण प्रतिक्षण आहार देतें चलते हैं।किसी बात को लेकर गुस्सा आया तो बड़ा नन्हा सा क्षण होता है क्रोध का, पलक झपकने मात्र में कितने ही शत- सहस्त्र कोटि बार बार उत्पन्न होकर नष्ट होने वाला क्षण होता है। लेकिन गुस्सा का संस्कार पैदा करते ही अगले क्षण फिर गुस्सा पैदा हो गया। अगले क्षण फिर गुस्सा ही गुस्सा के सँकर् इस चित्ताइड को देर तक आगे बढ़ाते चलतें हैं। कभी तो घंटेो गुस्सा चलता रहता है।क्रोध रुका तो कोई और संस्कार बनाना शुरू कर देंगे। वह तब तक चलती रही। फिर से और। कभी डर। कभी वासना। कभी कुछ और लोगों के संस्कारो के नष्ट होने की बारी ही नहीं आती।-पल-पल नया ही बनाये जा रहे हैं।🌼यदि हम संवार कर लें यानी रोक दिया जाए तो नए संस्कार नहीं बनते। तब चित्तदीप किसके बल पर चलती है? क्योंकि हमने नई संस्कार नहीं बनाई, तो कोई न कोई संस्कार- बीज जिसका फल हो सकता है, कुछ देर बाद आने वाला हो, अब जल्दी पककर जाएगा। इसे विपाक का त्वरणीकरण कह सकते हैं। तुरंत कोई पुराना कर्म-संस्कार चित्ताइड पर अपना फल लेकर आता है। यही उद्राना है। 🌺आया कोई पुराना कर्म-संस्कार चित्त-धारा पर अपना फल लेकर और उसके सहारे चित्त धारा आगे बढ़ने लगी। जैसा कर्म वैसा ही फल आया था। हम उसे समता से, प्रज्ञा से देखने लगे तो हुआ निरोध उसका। जितने जितने पुराने संस्कार क्षीण होते हैं उतना ही हल्कापन होगा ही। सही माने में खुशी होगी। दुःखो से छुटकारा होगा .——- 🌷कर्म- विपाक🌷विपश्यना साधना में जहाँ एक कर्म-विपाक का समूह उदीर्ण हुआ और प्रज्ञापूर्वक उसे क्षय कर लिया, वहाँ दूसरे कर्म- फलो का समूह तत्क्षण प्रकट होगा।इसके बाद एक पुराने कर्मो के विपाक का तामता लग जाता है। विपश्यना के प्रज्ञा- यज्ञ में उनकी आहुति लगती चली जाती है। यह क्रम जितना देर तक चलता है, उतनी देर तक खिले पुराणं होता रहता है।परंतु जब कोई कर्म- विपाक अत्यंत घनीभूत पीड़ा के रूप में प्रकट होता है – साधक की सारी सिट्टी- पिट्टी गुम हो जाती है, विद्या विलीन हो जाती है, प्रज्ञा क्षीण हो जाती है। पीड़ा के प्रति अकाशव- भाव रख ही नहीं पाता। बौद्धिक स्तर पर भले ही अनित्य अनित्य करता रहा हो, लेकिन वास्तविक स्तर पर ममत्व आ जाने के कारण उसे दूर करना चाहता है, और चाहने से वह दूर नहीं होता। अतः लगता है की यह तो नित्य है।उस स्थूल ठोसचन की घनसंज्ञा नष्ट कर, सूक्ष्म प्रकम्पन की अनुभूति प्रज्ञामयी विपश्यना साधना के अभ्यास द्वारा ही होती है,🌹गुरूजी, अगर आदमी आदमी में भेद नहीं मानना ​​चाहिए तो एक व्यक्ति दूसरे से दिखने में, स्वभाव आदि में अलग अलग क्यों होता है? निसर्ग सबको एक जैसा क्यों नहीं बनाता है? निसर्ग तो भेद भाव करता नहीं न.उत्तर – नहीं, निसर्ग कोई भेदभाव नहीं करता। प्रेमकर्ति हमारी स्वभाव कोई कृतियाँ।हर व्यक्ति अपनी समझदारी या नासमझी से अपना अच्छा या बुरा स्वभाव बनाता है।और स्वभाव बनाने का यह क्रम उसी जीवन का नहीं। है, कई जन्मों से चला आ रहा है। पूर्व जन्मों का स्वभाव इस जन्म के स्वभाव को प्रभावित करता है। गुरूजी, जब कर्म का फल आनेवाला होता है तो विपश्यना उसे कैसे काट सकती है? उत्तर — कर्म फल होगा तो पहले संवेदना आएगी। संवेदनना देखने लगेंगे तो जो फल होगा वह दुर्बल हो जाएगा।पेड़ में फल तो आया पर बड़ा ही नहीं हुआ, छोटा सा होकर गिर गया।यही तो भगवान् बुद्ध ने ढूंढ निकाला। यही विद्या तो उन्होंने सीखी और लोगो को सिखाई।🌷लेकिन अगर समझदार व्यक्ति अंतर्मुखी के साथ अपने स्वभाव की जड़ो तक पहुँच कर अपने स्वभाव को बदलने का प्रयत्न करे तो बदल सकता है।पसंद हो तो प्रत्येक व्यक्ति द्वारा अपने स्वभाव के अनुसार किए गए अच्छे बुरे कर्म का फल खाती है। इस प्रकार वह रंच मात्र भी भेदभाव नहीं करता। —————————🌹🌷जो भी हमने सत्त्म दोषपूर्ण किया है उसका फल तो होगा ही। हमने संवेदनना के रूप में उसे देखने शुरू कर दिया तो उसकी ताकत ख़त्म हो जाएगी ।मन लो बड़ा फल भी आ गया तो कुछ नहीं होगा।हम स्मराते रहेंगे, भई आ! जैसे किसी ने हमारा कुछ छीन लिया, ले लिया, तो क्या हुआ! हम तो मुस्कुराते रहेंगे।हमारे अच्छे कर्मो के अच्छे फल भी तो मिलेंगे। तो दुखी न होकर हमेशा प्रसन्न रहो। 🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा खड़िया नगला🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻

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