प्राप्त

जल में जड़ होती है
और पेड़ का प्रतिबिम्ब भी
पेड़ पे टहनियां होती हैं
और उनसे उभरती यथार्थ की
आकृतियां भी
जो इस जीवन में मिलता है
वो एक दिन खो जाता है
आंशिक तौर से नष्ट हो जाता है
किसी रोज
जीवन के किसी मोड़ पे
किसी बिंदु पर
पुनः प्राप्त होता है
वापिस अपने स्थान पे
लौट आता है
मिल जाता है
बस उसे पहचानने के लिए
एक दिल के दर्द में डूबी आह भरती आंख चाहिए
उसका नाम
उसका रूप
उसका स्वरूप
उसका अस्तित्व
सब बदल जाता है
पूर्व अवस्था में नहीं
एक बदली हुई अवस्था में
प्राप्त होता है
पर प्राप्त अवश्य होता है
यह पूर्णतः सत्य है
तनिक भी असत्य नहीं।

मीनल

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