एक पल की दुल्हन

एक पल की दुल्हन

उस दिन गाँव में बहुत चहल पहल थी। छोटी सी आदिवासी गाँव। चारों ओर लम्बी लम्बी सखुआ के विशाल पेड़ और महुवा वृक्षों से घिरा प्रकृति की गोद में बसा यह गाँव रसोइया जो करीबन सौ आदिवासियों का आशियाना अपने मे समोया हुआ। चारों ओर छोटी-छोटी पहाड़ियाँ और इस पहाड़ी में बन्दरों का सैकड़ों टोली अपनी जिन्दगी अपने उन्मुक्त जिन्दगी जी रहा था।
वर्षा रानी की विदाई लगभग हो चुकी थी। आज शारदीय दुर्गा पूजा है। विजया-दशमी की दिन। गाँव में चारों ओर चहल-पहल। सभी ग्रामीण क्या बड़े, क्या छोटे सभी नये-नये परिधान में सजकर मेले जाने की तैयारी में जुट गये थे। कुछ युवक एंव युवतियां अपनी पारंपरिक वेश भूषा में सजकर तैयार थे। तो कुछ मार्डन वेश भूषा में नजर आ रहे थे। शाम ढलने में चार घंटे की देरी थी। गाँव के लोग विजया-दशमी की मेला देखने झूंड के झूंड में निकल पड़े।
मेले में सभी घूम-घूम कर मेला का आनंद ले रहे थे। गाँव का मेला का नजारा ही कुछ और होता है। चारों और नये-नये परिधान में सज संवरकर लोग मेला का आनंद ले रहे थे। कोई कुछ खरीद रहा था तो कोई कुछ। बच्चे प्लास्टिक के खिलौने खरीदने में मशगुल थे, तो कोई हलवाई की दुकान में बैठकर मिठाई का स्वाद ले रहे थे और इस भीड़ में दो जवां दिल अलग ही अपनी ताना बाना बुनकर मेले की भीड़ में खो गया था। इस जवां दिल के मलिक थे महालाल हांसदा और उसकी सपनों की रानी चुड़की हेमरम। दोनों इसी गाँव में जन्में पले बढ़े सावन की सोलह बसंत पार कर चुके थे। जवानी की दहलीज पर दोनों पांव रख चुके थे। महालाल की नजरों में उसकी मेहबुबा चुड़की कब समां चुकी थी पता नहीं चला। महालाल चुड़की को जब देखता तो बस देखता ही रहता सांवली रंग छरहरा बदन,कमर तक झूलते लम्बे-लम्बे काले बाल और गालों में बना गड्डा और इसी गाल की गढ्ढेढे की गहराई में महालाल खो जाता और घंटों अपनी मेहबूबा की प्यारी प्यारी बातों की कलपना बुनकर ख्वाबों को दुनियाँ में उड़ता रहता था, पर महालाल अपनी दिल की रानी से एकांत में नहीं मिल पाया था जहाँ वह अपनी जज्बात और ख्यालात से अपनी प्रेमिका को अवगत कराता। समय पंरव लगाकर उड़ रहा था, पर आज संयोग दोनो प्रेमी जोड़ी के लिये माकुल था।
मेले में चुड़की एक चुड़ी की स्टॉल पर चुड़ी पहनने के लिये खड़ी थी। अकेली रंग विरंगी चुड़ीयों को वह निहार रही थी। इतने में महालाल हाथ में बाँसुरी लिये उस स्टॉल पर आ पहुँचा जहाँ

चुड़की अकेली खड़ी थी।
“कौन सी रंगा की चुड़ीयाँ खरीद दूँ रानी ?”
महालाल ने अपनी दिल की बात अपनी जुवां से कह डाला उसे इस बात का कोई परवाह नहीं था कि उसकी इन बातों से चुड़की नाराज तो नहीं हो जायेगी। प्रेम अंधा होता है सच्चे प्रेम करने वाला अंजाम की परवाह नहीं करते चुड़की भी महालाल की बातों को बुरा नहीं माना और मुस्कुराते हुए शिकायत भरी लहजे में उसने जवाब दिया।
“है तेरे पाकेट में गरमी जो मुझे चुडिियाँ पहनायेगा।”
“तुम पसंद तो करो मैं हूँ न।” महालाल ने जवाब दिया।
“है पाकेट में दम तो खरीद दो मुझे वो चुड़याँ जो मझे पसंद है। चुड़की ने तीखे नजर से महालाल को देखते हूए कहा।”
यह सुन महालाल के दिल की बीणा की तार में एकाएक झंकार सा हो उठा। चारों ओर प्यार की मधुर धुन उसे सुनाई देने लगी। वह खुशी के सागर में डूबने लगा और अचानक उसे कुछ पल बाद किसी ने झकझोरा तो वह हकोकत की दुनियाँ में लौट आया।
कहां गुम हो गये। चुड़की महालाल की हाथों को छुकर उसे हिला रही थी। महालाल को होश आया और चुड़की के कहने पर उसको ही पसेद की हरी हरी चुडिँयां उसको कलाई में सजा दिया।
एक बार दोनों प्रेमी जोड़ा एक दूजे को प्यार भरी नजरों से देखा और मुसकुराते हुए चुड़ी की स्टॉल से हाथों में हाथ लिये निकल पड़े।
महालाल ने चुड़की को कलाई थाम उसे मिठाई को दुकान पर ले गया। महालाल आज बहुत खश था। महीनों से जो ख्वाब उसने अपने मन में पाल रखा था आज उसकी मुरीद पुरी हो गई थी। खुशी से महालाल झूम उठा। उसने ढेर सारा मिठाईयाँ खरीद कर चुड़की के हाथों में डाल दिया।
सूरज ढल चुका था। गौघूलि बेला का आगमन हो चला था। चिड़याँ अपने अपने घोंसले लौट रहे थे। आकाश पश्चिम में सूरज की डुबती किरणों को लालिमा से रक्तिम हो चुका था। और महालाल चुड़की की गोद में बटबृक्ष के नीचे मदहोश हो बाँसुरी की धुन में प्रेम गीत का सुर में तराना गा रहा था। चुड़की महालाल के बालों को अपनी कोमल कोमल अँगुलीयों से सहला रही थी एसा लग रहा था कि उसका प्रेम जन्म-जन्म से एक दुसरे के लिये तरस रहा था। और न जाने कब रात हुई और कब सुबहा पता नहीं चला।
रात में दोनों जब घर ना पहुँचे तो घर व गाँव वाले बैचेन हो उठे। गाँव वाले आपस में चर्चा कर रहे थे कि मेला से जब हर कोई गाँव लौट आया है तो ये दोनों कहाँ गुम हो गये। गाँव वाले किसी अनहोनी घटना की याद कर और भी चिन्तित हो गये। तभी गाँव की उतर की ओर से दोनों प्रेमी जोड़ा उपर हुए। दोनों को साथ साथ देरव गाँव के प्रधान ने महालाल और चुड़की से सवाल किया
“तुम दोनों रात भर कहाँ थे?”
तब तक गाँव के अन्य लोग भी जमा हो चुके थे। दोनों को गाँव के देवालय बुढ़ा-बुढ़ी थान ले जाया गया। गाँव के सभी लोग बुढ़ा बुढ़ी थान के चबूतरे पर जमा हो गये। महालाल ने ग्रामीणों के समक्ष अपनी प्यार का इजहार किया और एक दुसरे से शादी भी करने की बात कहा।
प्रधान के पूछने पर चुड़की ने भी अपनी सहमति जताई।
चुड़की से एक माह के अन्दर महालाल को आदीवासी रीति रिवाज के अनुसार शादी कर लेने की फरमान प्रधान गाँव के ने सुना दिया।
दाेनों प्रेमी अब गाँव के एक छोर पर पर्णकुटी बनाकर रहने लगे। पर पति पत्नी का सामाजिक्र दरजा अभी इन दोनों को नहीं मिला था। आदिवासी युवक युवती शादी के पूर्व लीव इन रिलेशनशिप में रहते है पर पति पत्नी की दरजा पाने के लिये सामाजिक कानून के तहत रीति रीवाज से शादी करनी होती है और पूरे समाज को मांस भात एंव परंपरा के अनुसार शराब परोसना होता है। ये बाते भी गाँव के प्रघान ने कह सुनाया था।
दोनों प्रेमी गाँव में पति पत्नी की तरह जीवन यापन कर रहे थे, पर दोनों के पास इतने पैसे जमा नहीं हो पा रहा था दोनों शादी की रस्मे पुरी कर जात बिरादरी को मांस भात एवं शराब को पार्टी दे सके। गॉव वालो को भोज खिला सके।
समय तेजी से भागता रहा- भागता रहा और देरवते-देखते बारह बरस गुजर गये। मिहनत मजदुरी कर वे लोग अपना पेट पाल रहे थे। समय के बीच ये दोनों तीन बेटियाँ और एक बेटे को माँ बाप बन चुके थे।
महालाल को अब देशी शराब पीने की लत लग चुकी थी। सच है मनुष्य पहले शराब को पीता है पर बाद में शराब ही मनुष्य को पीने लगता है। शराब धीरे-धीरे महालाल के शरीर को दीमक की तरह चाटता जा रहा था। अचानक एक दिन वह बीमार पड़ा और चारपाई पकड़ ली। पैसे को तंगी के कारण महालाल अपना ईलाज किसी अच्छे डाक्टर से न करा पाया। आज भी गाँव में लोग दवाई के स्थान पर तांत्रिक के चक्कर में पड़ जाते है। बीमारी को नजर अंदाज कर इसे भूत प्रेत की चश्में से देखते है जहाँ ओझा गुणी जैसे ठग अपनी अपनी दुकान खोल कर लोगों को गुमराह करते है और पैसे ऐंठने का घंधा कर रहे है। महालाल भी ओझा गुणी के चक्कर में फँस कर अपना सब कुछ लुटा चुका था। अब बहुत देर हो चुकी थी। महालाल टीं.वी. बीमारी के गिरफ्त में बुरी तरह जकड़ चुका था। उसका हट्टा कट्टा शरीर अब जर्र-जर्र हो चुका था। शरीर नर कंकाल का ढाँचा मात्र रह गया था। उठ बैठ पाना भी अब उसके बस की बात नहीं थी और एक दिन अचानक सुबह पॉच बजे उसकी साँसे उसका शरीर छोड़ दिया। महालाल इस दुनियाँ को अलविदा कह चार नावालिग बच्चे और पत्नी को छोड उस दनियाँ में चला गया था। जहाँ से कोई आज तक वापस लौटकर नहीं आया है। चुड़की चार बच्चे के साथ इस संसारिक समुद्र की भँवर में फस कर रह गई थी। वाह रे विधाता का लेख जिस मांग को पिया की सिन्दुर से भरने के लिये चुड़की दिन रात मिहनत मजदूरी करती रही कि उसके भी मांग सुहागन को तरह लाल लाल चमके वो मांग आज भी सूनी की सूनी रह गई। जिस सिन्दुर को पाने के लिये वो वर्षों से लालायित रही आज बिधाता ने भी उसके साथ क्रूर मजाक कर दिखाया। चुड़की दहाड़े मारकर रो रही थी बच्चे भी माँ के साथ रो रहे थे। महालाल का मृत शरीर चारपाई पर पड़ा था। गाँव में यह खबर जंगल की आग की तरह फैल चुकी थी। गाँव के लोग चुड़की को पर्ण कुटीर प र जमा होने लगे।
इतना सुन गाँव के प्रधान भी आये, और ग्रामीणों से इस विन्दु पर चर्चा किया कि चुडकी अब बिन व्याही माँ है। उसका बच्चा भी लावारिश कहा जायेगा। संताली कानून के अनुसार बाप को संपति पर इनके बेटे का तब तक हक और पिता का नाम नहीं मिलेगा जब तक कि महालाल के हाथों से चुड़की की मांग में सिन्दुर ना डाल दे। यह बच्चा तब तक महालाल का औलाद नहीं कहलायेगा जब तक की चुड़की की शादी की रश्म महालाल के शरीर से पूरा न कर लिया जाय। अगर बच्चे को पिता का नाम चाहिये तो अगर पिता की संपति में बच्चे का हक चाहिये तो और अगर चुड़की को पति का नाम चाहिये तो मृत महालाल की हाथों से चुड़की की सूनी मांग में सिन्दुर डालवाना ही होगा। प्रधान का फैसला सभी ने माना फिर गाँव वालों की मौजूदगी में शादी की रश्म पुरा करने को योजना की शुरूवात हो गई।
चुड़की को दुल्हन को तरह सजाया गया उसे दुल्हन का जोड़ा पहनाया गया कलाई में लाल लाल चुड़ियाँ पहनाई गई। कुछ पल पूर्व जहाँ शोक और मातम का आलम था वहाँ अब शहनाई की घुन गुंजने लगी। मातम का माहौल वैवाहिक कार्यक्रम में तबदील हो गया। औरते मातम को भूलकर मंगल गीत गाने लगी। मांदर को थाप पर युवक युवतियया झूमने लगे। विधाता को अजीब लीला है यह धटना अपने आप में इक इतिहास लिख डाला था। इघर मृत महालाल के निर्जीव शरीर को दुल्हा का जोड़ा पहनाया गया। दुल्हन को सजाया जा चुका था। क्या अजीब शमां दृष्टिगोचर हो रहे थे ३धर दुत्न्हा मृत पड़ा चारपाई में सोया था तो दुसरी ओर विधवा चुड़की दुल्हन बन अपनी पिया की इन्तजार कर रही थी कि उसका सपनों का राजकुमार घोड़ा पर सवार होकर आयेगा और पलकों को पालकी में बिठाकर ले जायेगा। गाँव के प्रधान ने महालाल को निर्जिव अंगुली में सिन्दुर लगाकर चुड़की को सूनी मांग भरवा दिया। अब चुड़की सुहागन की खिताब पा चुकी थी बच्चे पिता का नाम और हक पा लिया था। यह शादी भी अजीब हुई। अपने आप में एक इतिहास लिख गया। एक मुर्दे ने अपनी प्रेमिका की मांग में सिन्दुर डाल कर उसे अपना पत्नी की हक समाज से दिलवा दिया था। जो काम महालाल जीते जी नहीं कर पाया था वह मरकर भी पूरा कर दिखाया था।
सच है प्यार करने वाले अंजाम से नहीं डरते है
यही सच्चा प्यार है और सच्चा प्यार अमर होता है।
अब चन्द पलों के पश्चात चुड़की की मांग धो डाला गया। उसके हाथों को चुरियाँ फोड़ डाली गई। दुल्हन का लिबास उतार कर उसे विधवा का लिबास पहना दिया गया। घर में जो मंगल गीत गाये जा रहे थे वहाँ पुनः मातम का साम्राज्य छा गया। लाश को कफन में लिपटा दिया गया। और गाँव वाले एक क्षण के लिये बना दुल्हा को शमशान की ओर लेकर चले गये। चुड़की के लिये आज का दिन बिडबना से भरा दिन हो गया। चुड़की को समझ नहीं आ रहा था कि आज का दिन उसके लिपे खुशी का दिन है या गम का। इसे परिभाषित करना उसके लिये संमव नहीं था। वह पत्नी बनने की खुशी में हँसे या विधवा बनने की गम में रोये। विधाता ने अजीब मजाक इसके साथ किया था। जिस वादा को महालाल जीते जी किया था वह मरकर भी पूरा किया था। भले ही अग्नि के सामने उसने सात फेरे नहीं लगाया फिर भी चुड़की को इस दुनिया में उसका हक दिलाकर ही गया। इधर चुड़की गम को समुद्र में डूबकर रह गई थी तो दूसरी ओर महालाल का मृत शरीर पंच तत्व में विलीन होने के लिये चिता में घूघू जल रहा था।
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