बचपन

बचपन

एक अरसा हो गया, बारिश के पानी में नहाये हुए
मन में एक बच्चा अभी भी बैठा हुआ है,
पुराने कुछ सपने सजाये हुए

खो दिया है खुद को ज़माने के इन रिवाज़ों में इस कदर
बरसों बीत गए हैं एक कागज़ की कश्ती को
पानी में बहाये हुए

ठन्डे बंद कमरों से निकलकर छत पे बैठना अब मुनासिब नहीं
असीम तारों में अब उन सात सितारों को फिर से ढूंढने का,
अब हमें टाइम नहीं

थोड़ी देर से मिलते थे खत लेकिन उनसे निकले जज्बात सच्चे थे
लोग पुराने ही सही लेकिन दिल के बड़े अच्छे थे

अब तो फ़ोन को ही जरिया समझ बैठे हैं, रिश्तों को निभाने का
कसूर किसी का नहीं, बदलता वक़्त है बस ये ज़माने का

चंद सिक्के हमारी ढेरों जरूरतें पूरी करने के लिए काफी थे
यकीं ही नहीं होता की इन लम्हों को भी जीने वाले आप ही थे

एक अरसा हो गया घर की दीवारों पे टेढ़ी मेंढी लकीरों से
एक तस्वीर बनाये हुए
मन में एक बच्चा अभी भी बैठा है,
पुराने कुछ सपने सजाये हुए
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