देश ये अखंड धरा

देश ये अखंड धरा

ये देश जरा ये अखंड धरा
चमके चम-चम ये स्वर्ण ख़रा
छूने के लिए इस मिट्टी को
भूमि पर खुद रब उतरा

रसधार लिए बहती सरिता
बहे तेज़ तरंग गाती कविता
सागर के प्रेम में वशीभूत
सागर को भी इसने जीता

त्याग दिया निजदेश ने जिनको
इस धरा ने उनको संभाला
लेकर धरती के आंचल से
दिया उनको भी एक निवाला

दुनिया को संभाला नारी ने
कभी न्याय किया जो गीता ने
जब हुआ मान कम नारी का
तो जन्म लिया माँ सीता ने

कई जन्मे धरती पर महान
रचना से पहले किया बखान
मिट्टी पर हुए जो वीर शहीद
कण-कण करता उनका गुणगान

है वृक्ष धरा पर महादानी
अपना सब कुछ दे देते है
हम क्यों इतने कंजूस बने
बिना कीमत के ले लेते है

है नमन तुझको पुण्य धरा
संसार सारा तुझमे समाँ
आदि से लेकर अंत धरा
ना कोई दूजा तेरे समा ❖❖❖

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