फैसले की घड़ी

फैसले की घड़ी

मिली नज़रें उनसे तो समझा इबादत हो गई।
देखते ही रह गए और उनसे मुहब्बत हो गई।।

तरसते थे दो मीठे बोल सुनने को हम।
सियासत दिल पर की और हुकूमत हो गई।।

फैसलों की घड़ी थी जिन्दगी में जब यारों।
जमाने की उसी समय देखो कैसी बगावत हो गई।।

कौमी एकता के तराने पढ़े थे जब गुलाम थे।
अब फिर से जमाने मे कैसी ये नफरत हो गई।।

प्यार की मंजिलें कमजोर नहीं थी मगर क्या करें।
जाने क्यों यारों खोखली इमारत हो गई।।
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