ठिठुरती भोर

ठिठुरती भोर

सिकुड़ रही है कुदरत सारी,
ठण्डी ठण्डी लहरों से।
भोर ठिठुरती देख गगन से,
सहलाता रवि किरणों से।
बिछा गयी है रात अँधेरी,
तुहिन बिंदु कुछ तिनकों पर।
उषा काल में चमक उठे हैं,
मानो सब मोती बनकर।
सूर्य चुराने आया मोती,
वसुधा के आवरणों से।
सिकुड़ रही है कुदरत सारी,
ठण्डी ठण्डी लहरों से।।

मानो वृध्दा हुई प्रकृति,
दिखती धुँधली कुहरे से।
सारी गतियाँ शिथिल हुई हैं,
शीत दे रही पहरे-से।
जल राशि भी सिमट रही है,
क्या नदियाँ क्या नहरों से।
सिकुड़ रही है कुदरत सारी,
ठण्डी ठण्डी लहरों से।।

हिम की श्वेत वृष्टि से धरती,
लिये रजत सी चमक मधुर।
गेंदे पाटल कमल कुसुम सब,
करते हैं अभिमान प्रचुर।
ओढ़ धूप की चादर बैठी,
धरा शिथिल हो पहरों से।
सिकुड़ रही है कुदरत सारी,
ठण्डी ठण्डी लहरों से।।
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