गाँव और शहर

गाँव और शहर

हद है हर शहरी गाँव को
कोसे, उसे कहाँ पता शहर
की जननी गाँव ही तो है।
और जहाँ बसे भारत माँ
वो गांव ही तो है
जहाँ मिले संस्कृति, सभ्यता
भाईचारा का संदेश वो
गाँव ही तो
दम घुटे, जब अपने भी
पराये हो जाए तब
गाँव क्यों प्यारा लगे, अपना लगे।।
शहरी बुद्धिजीवी जब गाँव को
दें गवार की डिग्री।
तो सुकून के लिए क्यों ढूढें अपना घर
फिर क्यों लगे गाँव ही सबकों सपना।। ❖❖❖

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