सपनों की मंजिल

सपनों की मंजिल

सुबह के नौ बजे, नवीन अब तक अपने कमरे से बाहर नहीं निकला। उसकी बेचैन, माँ अपने कामों में व्यस्त होने के बावजूद भी, उसका ध्यान उसके कमरे के दरवाजे पर ही था। जब रहा नहीं गया तो नीचे से ही आवाज लगाई- “नवीन, ओ नवीन”।
पर कोई प्रत्युत्तर नहीं मिला। घबराकर उसने काम छोडा और
दौडकर, उपर वाले कमरे में गई, दरवाजा खुला ही था। उसने अंदर जाकर देखा, नवीन वहां नहीं था। वहीं से रोती-चिखती नीचे की तरफ आई और कहने लगी- “सुनोजी! नवीन के बाबूजी। नवीन अपने कमरे में नहीं है।”
सुनकर सुबोध चटर्जी हैरान रह गये। उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था उन्होने फिर पूछा, “क्या कहा- नवीन अपने कमरे में नहीं है।” और खुद दौडे-दौडे उपर वाले कमरे में जाकर देखा, पुरे कमरे में, गुसलखाने और छतपर भी देखा पर नवीन का घर में कोई पता नहीं था। जवान बेटे के अचानक लापता होने से वह बेचैन हुए।
सुबोध ने उसके कॉलेज में उसके दोस्तों को फोन करके पता लगाया, वहाँ भी नहीं था। कुछ देर बाद रिश्तेदारों और परिचितों को भी फोन करके पूछताछ की। पर कहीं से कोई खबर नहीं मिली। अब तो और भी परेशान हो गए।
नवीन की माँ का, रो-रो कर बहुत बुरा हाल हुआ। धीरे-धीरे खबर आग की करह पुरे मोहल्ले में फैल गई। पडौसियों जान-पहचान वालों का आना-जाना हुआ। हर कोई पल दो पल ठहरकर दोनों को समझा-बुझा कर चला जाता। उन्ही में से एक सज्जन ने सांत्वना के साथ – साथ सलाह भी दी। “युँ धीरज खोने से बात नहीं बनेगी, सुबोध बाबू, आज शाम तक इंतजार कर लो अगर कल सुबह तक न आये तो एक बार पुलिस में भी रिपोट लिखवा दो। शायद उनसे कुछ सहायता मिल जाए।”
सुबोध चटर्जी को भी यह बात जंची। दूसरे दिन उन्होने वहीं किया। पर जल्दी खबर मिलने की कोई उमीद न थी। इस सारी भाग-दौड में सुबह से शाम हो गई। मालाने खाना पीना भी छोड दिया। सुबोध ने उसे बहुत समझाया – “इस तरह खाना–पीना छोडने से वह आ तो नहीं जायेगा। तुम्हें मेरी कसम, कुछ तो खा लो।”
सुबोध ने बडी मुश्कील से खुद को और माला को भी संभाला उसे मनाने के लिये रुठ कर कहा-“एक तो वो हमें छोडकर चला गया और अगर तुम्हें कुछ हो गया तो मैं कैसे जी सकुँगा? “माला कुछ नहीं बोली। बस रोये जा रही थी, बहुत मिन्न्ते करके, बडी मुश्कील से सुबोध ने उसे संभाला।
दिन बीते रातें बीती। दिन हफ्ते, हफ्ते महिने और युँ कई साल बीते। पर नवीन की कोई खबर नहीं मिली।
एक दिन शाम दफ्तर से आने पर आदतानुसार उनकी नजर

दरवाजे पर लगे लेटरबॉक्स पर पडी। एक लिफाफा हाथ लगा। उठाकर देखा तो उसके पीछे प्रेषक नवीनका नाम था। उसे आश्चर्य का एक मीठा सा धक्का लगा। खुशी से वो उछल पडे। खबर पढकर तो और भी खुश हो गए। अपनी पत्नी को आवाज दी “माला ओ-माला सुनो तो”
क्या बात है जी, आज बहुत खुश है “हाथ में चाय पानी और नाश्ते की ट्रे संभाले हुए कीचन से आती हुई उसने खुद से ही कहा। आवाज तो इनकी ही थी, पर ये कहाँ रह गये? यही सोचते
हुए ट्रे टीपॉय पर रखकर दरवाजे के पास आई। देखा तो, पतिदेव लेटेरबॉक्स के पास ही थे।
उसने एक बार फिर पूछा “क्या बात है? आज वही रहना है?”
“अरे अपने नवीन की चिटठी आई है। लिखता है, उसने आर्मी का प्रशिक्षण पूरा कर लिया है। उसे वही नोकरी मिल गई है। अब वह ऑर्मी ऑफसर बन गया है। उसे उसके सपनों की मंजिल मिल गई है। बस कुछ ही दिनों में आ रहा है।
अचानक नवीन की खबर पाकर माला बहुत खुश हो गई। उसे तो यकीन ही नहीं हो रहा था। पर चिट्ठी देखकर तसल्ली हुई। वह बोली-“तुम तो युँही उसके पीछे पडे रहते अगर डॉक्टरी पढने की जिद न की होती तो शायद वो घर से भाग न जाता।
सुबोध को अपनी गलती का एहसास हुआ और पछताते हुए बोले “हाँ, माला, मुझे अपनी गलतीका एहसास हो गया है। उसे उसकी इच्छा से उसका करियर चुनने की आजादी देता तो हमें व्यर्थ की परेशानी न उठानी पडती।” कहकर कुर्सीपर बैठ गए।
माला ने सामने बैठते हुए मुस्कराते हुए कहा- “आखिर वही हुआ न जो वह चाहता था। बेटा किसका है? जैसे बाप वैसा बेटा जिद्दी नंबर वन।”
वैसे तुम्हारा भी तो असर है थोडा-थोडा। किसी तरह अपनी बात

मनवा ही लेती हो। कुछ भी हो, है तो हमारा ही” सुबोधने कहा। माला ने तुरंत कहा- “नहीं अब वो तुम्हारा है न हमारा। अब तो वह भारत माँ का बेटा है।”
हां-हां क्युँ नहीं, भारत माँ की सेवा में पूरा जीवन जो समर्पित करने जा रहा है।
“सुबोधने कहा- ” देखा, कितने ऊँचे विचार थे उसके, आप ही समझ नहीं पा रहे थे।
माला ने कहा- “तुम तो समझती थी, जब तुम्हें कोई एतराज नहीं
है तो मुझे क्युँ होने लगा?”
सुबोधने कहा- “मुझे क्युँ होगा एतराज, मेरा बेटा देश की सेवा करने जा रहा है। सबके सामने सर उठाकर कहुँगी मेरा बेटा
हमारे देश की सेवा कर रहा है।”
मालाने गर्वसे कहा- “वाह! भई वाह! माँ हो तो ऐसी”
सुबोध ने कहा- “बिल्कुल तुम्हारे जैसी झांसी की रानी”
अंतिम शब्द कुछ इस तरह कहा कि माला बडे जोर से खिल खिलाई। जिसे देखकर सुबोध भी जोर से हंस पडे। दोनों ने बाद में बेटे की वापसी की खुशी चाय पीकर मनाई।
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