हिम

हिम

नभ से गिर रही शीत में
हिम रुई के फाहे जैसी।
हवा है मानों ठिठक देखती
यह अभ्र की माया कैसी।।

ऐसा लगता ‘ ख’ में कोई
खिली हुई पंखुड़ी कपास है।
चिंदी-चिंदी चिटक-चिटक
आती ‘ भू ‘ पर मंद मंद है।।

अथवा है यह ‘ख’ गंगा का
शुभ्र फेन जो छलक रहा।
‘भू’ गंगा को निर्मल करने
गिरि-श्रृंगों पर उतर रहा।।

या अम्बर में नन्दलाल ने
फोड़ दिया भाण्ड नवनीत।
शांत हवा में तैर रहा ज्यों
बन अम्बर की अद्भुत प्रीत।।

या मोती के शुभ्र हार हैं
जो अकाश में टूट पड़े।
लड़ियों के सम लटक लटक
धरती उपर अब बिखर रहे।।

पगडंडियाँ विलुप्त हो गयीं
शुभ्र हुए सब पर्वत खेत।
द्रुम सिर पगड़ी सजी हुई
है, हरी किनारीदार श्वेत।।

शांत दिशाएँ जन स्थिर हैं
खग नीड़ों में बैठे शांत।
बच्चे खेल रहे आनन्दित
भींग रहे हैं उनके गात।।
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