युग पुरुष

युग पुरुष

बलशाली का शौर्य कहो,
क्या छिपता है?
उसके स्वेद-बिन्दु से ही,
प्रस्तर भी पिघलता है।

जिसमें अग्नि सा तेज न हो,
वह सूर्य कहां कहलाता है।
जिसमें ध्वनि की कोई गूंज न हो,
वह तूर्य कहां कहलाता है।

जिसकी भुजाओं में दृढ़ता हो,
वहां “दशरथ मांझी”बसता है।
जिसके आगे पर्वत भी,
नत्-मस्तक होकर झुकता है।

शून्य से सृष्टि रचो, बढ़ो तुम,
पांच्जन्य सम नाद करो।
मृत्यु जीवन का परम् सत्य,
युग-पुरुष बढ़ो सत्कार करो।
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